सेवा हमारे पुनर्जन्म के पापों को धोने का साधन है : डॉ. भागवत

डॉ. भागवत ने किया गांव पट्टीकल्याणा में सेवा साधना एवं ग्राम विकास केंद्र का शिलान्यास
पानीपत। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के माननीय सर संघचालक डॉ. मोहन भागवत ने कहा कि सेवा हमारे पुनर्जन्म के पापों को धोने का साधन है। इसलिए सेवा करने वाले को मन में अंहकार नहीं करना चाहिए बल्कि मन में अपनत्व को रखकर सेवा कार्य करने चाहिएं। डॉ. भागवत शनिवार को समालखा के गांव पट्टीकल्याणा में श्री माधव जन सेवा न्यास द्वारा बनाए जा रहे सेवा साधना एवं ग्राम विकास केंद्र का शिलान्यास करने पहुंचे थे। डॉ. मोहन भागवत व जैन मुनि उपाध्याय गुपती सागर ने शिलान्यास एवं भूमि पूजन से पूर्व पौधा रोपण भी किया। इस अवसर पर उनके साथ गीता मनीषी ज्ञानानंद महाराज, रवि शाह महाराज गनौर आश्रम, स्वामी मोलड़ नाथ मडलौडा आश्रम तथा श्री माधव जन सेवा न्यास के अध्यक्ष पवन जिंदल भी मौजूद रहे। ‘देश हमें देता है सबकुछ हम भी तो कुछ देना सीखें’ गीत के साथ कार्यक्रम की शुरूआत की। डॉ. भागवत ने कहा कि गांव पट्टीकल्याण में बनने वाले इस सेवा साधना एवं ग्राम विकास केंद्र को लेकर काफी पहले से विचार चल रहा था और आज इसका शुभारंभ हो गया है। यह समाज का समाज के लिए चलने वाला एक प्रकल्प है। इस प्रकल्प को खड़ा करने में यहां काम करने वाले एक मजदूर से लेकर इसकी देखरेख करने वाले संघ के अखिल भारतीय अधिकारी तक का इसमें योगदान है। उन्होंने कहा कि जरूरतमंद को आगे बढ़ाना ही सेवा है। सामथ्र्यवान को समाज को देने की प्रवृति बनानी चाहिए। उन्होंने कहा कि मन में अपनत्व लेकर जो कार्य किया जाता है उसे ही सेवा कहा जाता है। पाश्चात्य संस्कृति में सेवा को सर्विस कहा जाता है और जब हम किसी से सर्विस (सेवा) लेते हैं तो उसके बदले में हमें उसे मान-धन वैगेरा देना

पड़ता है लेकिन भारतीय संस्कृति में सेवा कार्य की कल्पना केवल देने की है लेने की नहीं। हमें किसी को कुछ देते समय मन में किसी प्रकार का अहम नहीं रखना चाहिए बल्कि हमें यह

यह-यह जन कल्याण के कार्य होंगे
गांव पट्टीकल्याण में बनने वाले सेवा साधना केंद्र के अंदर एक साथ दो हजार कार्यकर्ताओं के बैठने की व्यवस्था रहेगी। इसके अलावा इसमें पुस्तकालय, चिकित्सालय, ध्यान लगाने के लिए मेडिटेशन हाल, मंदिर, गौशाला भी बनाई जाएंगी।

सोचना चाहिए कि हमें जो कुछ मिला यहीं से मिला और जो कुछ भी दिया यहीं पर दिया। डॉ. भागवत ने कहा कि यदि हमें मोक्ष प्राप्त करना है तो इसके लिए हिमालय पर जाकर तपस्या करनी पड़ती है लेकिन यदि हम निस्वार्थ भाव से सेवा कार्य करते हैं तो हमारे ह्रदय में हिमालय जैसी ऊंचाई पैदा हो जाती है। इसके बाद हमें तपस्या करने के लिए कहीं जाने की जरूरत नहीं पड़ती बल्कि सारी साधना यहीं पर मिल जाती है। उन्होंने कहा कि सेवा करने वाले को चिंतन करना चाहिए और चिंतन करने वाले को सेवा करनी चाहिए। सारी सृष्टि अपनी है और यहां रहने वाला हर प्राणी हमारा अपना है यह अनुभव करना चाहिए। हमारा जन्म केवल कमाने के लिए नहीं बल्कि बांटने के लिए भी हुआ है। हमें 100 हाथों से कमाना चाहिए और 1000 हाथों से बांटना चाहिए।

पाश्चात्य संस्कृति में अमीरों का चरित्र लिखा जाता है जबकि भारतीय संस्कृति में अमीरों का नहीं दान देने वाले भामाशाह का चरित्र लिखा जाता है। पाश्चात्य संस्कृति में सत्ताधीशों का चरित्र लिखा जाता है जबकि भारतीय संस्कृति में समाज का मार्गदर्शन करने वाले भगवान राजा राम, श्रीकृष्ण, महाराणा प्रताप, छत्रपति शिवाजी जैसे राजाओं का चरित्र लिखा जाता है। उन्होंने कहा कि हमारा जन्म जीवन यापन करने के लिए नहीं बल्कि समाज को कुछ देने के लिए हुआ है। इसलिए हमें सीखा हुआ कार्य, कमाया हुआ पैसा व मिला हुआ

समय समाजहित के लिए प्रयोग करना चाहिए। डॉ. भागवत ने कहा कि स्वयंसेवकों द्वारा एक लाख 75 हजार से अधिक सेवा कार्य चलाए जा रहे हैं। हमारे स्वयंसेवक सेवा कार्य करने वाले प्रकल्प खड़ा कर रहे हैं। गांव पट्टीकल्याण में बनने वाला सेवा साधना केंद्र समाज कल्याण में बड़ा प्रकल्प बननेगा। इस अवसर पर कार्यक्रम में केंद्रीय राज्य मंत्री राव इंद्रजीत, विधानसभा

अध्यक्ष कंवर पाल, उद्योग मंत्री विपुल गोयल, परिवहन मंत्री कृष्ण पवार, खनन मंत्री नायब सैनी, भाजपा अध्यक्ष सुभाष बराला, विधायक रविंद्र मछरोली, महिपाल, रोहिता रेवड़ी, चरण

सिंह, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अखिल भारतीय सह व्यवस्था प्रमुख अनिल ओक, क्षेत्रीय कार्यवाह, क्षेत्रीय प्रचारक बनवीर, प्रांत प्रचारक विजय कुमार, प्रांत कार्यवाह देव प्रकाश भारद्वाज

सहित समाज के गणमान्य लोग मौजूद रहे।

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