प्रस्तावित विवाह कानून (संशोधन) अधिनियम, २०१० की तीव्र भर्त्सना

By Rajesh Vakharia  : सेव इंडिया फैमली फाउनडेशन के रिसर्च विंग के द्वारा इस दस्तावेज का निर्माण हुआ जो कि पुरुषो के अधिकार सम्बन्धी आन्दोलन में अग्रणी भूमिका का निर्वाह कर रहा है.

सेव इंडिया फैमली फाउनडेशन इस प्रस्तावित विवाह कानून (संशोधन) अधिनियम, २०१० की तीव्र भर्त्सना  करता है. इस संशोधन से ये बात प्रमाणित हो जाती है कि आज भी समाज में पुरुष के प्रति घृणा अपने चरम पे है जिसको स्थायी आधार  फेमिनिस्टो द्वारा निर्मित ऐसे संशोधन  कर रहे है.  आज के आधुनिक समाज में भी वोही पाषाण युग में व्याप्त दकियानूसी विचारधारा प्रचलित है कि पुरुष के ही कंधो पर घर के  संचालन का भार है जबकि आज का युग पुरुष और महिलाओ के समानता की बात करता है. ये मानता है कि दोनों वर्गों को समान अधिकार प्राप्त है.  लेकिन समाज में ठीक इसका उल्टा है.  आर्थिक सुरक्षा प्रदान करना आज भी पुरुष का कर्तव्य माना जाता है जो कि पुरुषो के शोषण  का कारण बनता है.
इस प्रस्तावित संशोधन कि इस बात के लिए आलोचना की जा रही है कि संशोधन के जरिए पुरुषो के लिए जीने की डगर  और कठिन हो गयी है, उनके जीवन में विषमता और बढ़ गयी है इन उलझाव भरे संशोधनों से.
इस प्रस्तावित संशोधन  की मुख्य बाते है: 
१. ये संशोधन “शादी टूटने और दोबारा रिश्ता कायम न होने'” की स्थिति को तलाक का पर्याप्त आधार देता है.
२. ‘शादी टूटने और दोबारा रिश्ता कायम न होने’ की स्थिति में महिला के पास इस आधार पर अपील का अधिकार होगा, लेकिन पुरुष के पास ऐसा कोई कानूनी हक नहीं होगा. कैबिनेट नोट के अनुसार कभी न सुधरने वाले रिश्ते के नए प्रावधान के तहत पति की ओर से दायर तलाक के आवेदन का पत्नी विरोध कर सकती है। लेकिन पति को ऐसा करने का अधिकार नहीं होगा। मालूम हो कि जून 2010 में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की अध्यक्षता में हुई कैबिनेट बैठक में हिंदू विवाह अधिनियम-1955 में संशोधन के लिए विधेयक पेश किए जाने को मंजूरी दी गई थी।विधेयक की सबसे खास बात यह है कि इसमें पत्नी को अधिकार दिया गया है कि वह इस आधार पर तलाक मांग सकती है कि उसका दांपत्य जीवन ऐसी स्थिति में पहुंच गया है, जहां विवाह कायम रहना नामुमकिन है।
३.विवाह कानून (संशोधन) विधेयक, 2010 में यह प्रावधान भी रखा गया है कि पति की संपत्ति में तलाक लेने वाली महिला का हिस्सा भी होगा।
इस विधेयक के मुताबिक महिलाओं को तलाक के बाद भी पति की संपत्ति में पूरा अधिकार होगा। हालांकि उसे इसमें से कितनी संपत्ति दी जाएगी, इसका फैसला अदालत मामले के आधार पर करेगी।
४. इस कानून की प्रस्तावना को पढ़कर ये आसानी से समझा जा सकता है कि महिलाओ का पलड़ा भारी है और पुरुष के हितो को दरकिनार कर दिया गया है.
संक्षिप्त इतिहास इस प्रस्तावित संशोधन से जुड़ा हुआ: 
मालूम हो कि जून 2010 में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की अध्यक्षता में हुई कैबिनेट बैठक में हिंदू विवाह अधिनियम-1955 में संशोधन के लिए विधेयक पेश किए जाने को मंजूरी दी गई थी। इस सिलसिले में ये भी जानना उचित रहेगा कि सर्वोच्च अदालत ने भी वैवाहिक जीवन में कभी न सुधर सकने वाले रिश्ते के आधार तलाक को मंजूरी देने के लिए विवाह अधिनियम में संशोधन करने की बात कही थी। न्यायाधीश मार्कण्डेय काटजू व न्यायाधीश वीएस सिरपुरकर की पीठ ने भी इस संशोधन आवश्यकता महसूस की थी ताकि इस आधार पर तालक मान्य हो सके. लेकिन संशोधन के प्रावधानों पर एक निगाह डालने के बाद ये बात स्पष्ट हो जाती है कि ये पुरुषो से धन उगाही का नया माध्यम बनाने वाला है.
सबसे हास्यास्पद बात ये है कि इन नए प्रावधानों के तहत कोर्ट को डिक्री देने का आधार नहीं होगा अगर पत्नी को समुचित आर्थिक मदद नहीं प्रदान की गयी है ”  महिला की आर्थिक सुरक्षा ” के अंतर्गत.
नए प्रावधान के तहत पति की ओर से दायर तलाक के आवेदन का पत्नी विरोध कर सकती है। लेकिन पति को ऐसा करने का अधिकार नहीं होगा।
इसमें ख़ास बात ये है कि ये विरोध महिलाओं के तरफ से ज्यादा प्रबल होगा इस अंदेशे के तहत कि इन्हें पर्याप्त आर्थिक मदद नहीं मुहैय्या कराई गयी है.
इस तरह के प्रावधानों से ये स्पष्ट है कि समाज की रीढ़ को तोड़ने की पूरी तैयारी कर ली गयी है. लिहाजा इस तरह के घोर पुरुष और समाज विरोधी प्रावधानों का हम पुरुष संघटन तीव्र भर्त्सना करते है.  इतिहास साक्षी है कि भूत में हमने ऐसे पक्षपातपूर्ण तौर तरीको का हमने घोर विरोध किया है जो पुरुष के अधिकारों का दमन करते है ये प्रचारित करने के बाद भी कि दोनों वर्ग समान अधिकार रखते है. इस मामले में ये जाहिर करना उचित रहेगा कि इस मामले में समस्या  निवारण हेतु गठित स्टैंडिंग कमेटी जिसकी अध्यक्षता श्री शांताराम नाइक ने की थी सेव इंडिया फैमली फ़ौंडेशन के मेम्बरों और अन्य पुरुष संघटनो ने इनसे मिलकर अपना पक्ष रखा था.  इन्हें इस बात से अवगत कराया था कि  इस तरह के दमनकारी और पक्षपातपूर्ण प्रावधानों का पुरुष संघटन तीव्र निंदा करते है.  इन्हें इस बात से अवगत  कराया गया था कि कानून के प्रावधान को वर्ग विशेष के प्रभाव से मुक्त रखा जाए. इन्हें जेंडर न्यूट्रल रखा जाए ताकि पुरुष वर्ग अनावश्यक आर्थिक नुकसान से ऊपर रहे लेकिन खेद की बात है कि हमारे विरोध की अवहेलना की गयी.
पुरुष संघटनो के आपत्तियों की अवहेलना:    
स्टैंडिंग कमेटी पैनल ने अविवेकपूर्ण रवैय्या अपनाते हुए पुरुष संघटनो के मांगो को दरकिनार कर दिया. इस बात से पुरुष संघटन बेहद आहत है कि उनके इस मसले पर जायज आपत्तियों को दरकिनार करते हुए बिना उनका उचित निस्तारण किये ही विवाह संशोधन को कैबिनेट स्तर से पास करा लिया गया. ये सरासर मनमानापूर्ण और तानाशाही रवैय्या है कि जिन बात पे हमे आपत्तिया थी उन पर ध्यान ना देते हुए एक वर्ग विशेष का ख्याल रखा गया.
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                           अगर ऐसी परिस्थितिया पैदा होती है तो क्या होगा ?
१. अगर शादी के चंद महीनों बाद ही शादी टूट जाए और शादी के इन्ही चंद महीनों में पति ने अपनी गाढ़ी कमाई से कोई प्रापर्टी खरीदीं हो तो ऐसे में इस नए संशोधन के प्रावधानों के अंतर्गत उसका भविष्य अंधकारमय है क्योकि अब उसे अपनी संपत्ति का आधा हिस्सा देना पड़ेगा.
२.भारत की आर्थिक स्थिति कमजोर होगी क्योकि इन नए नियमो के तहत कोई प्रापर्टी खरीद कर कर उसे आधा आधा नहीं बाटना चाहेगा.
३. सबसे आश्चर्य की बात ये है कि घर परिवार को पति और पत्नी तक ही सीमित कर दिया गया है. जबकि पति के ऊपर अपने बुजुर्ग माता पिता की भी जिम्मेदारी होती है.  जब संपत्ति का आधा हिस्सा पत्नी के नाम हो जाएगा तो इससें केवल घर ही तबाह होगा. बुजुर्ग घर से सड़क पर आ जायेंगे.
४. अगर परिवार एक संयुक्त परिवार है तो इस संपत्ति का बटवारा कैसे होगा आधा आधा ? बाकी लोगो के अधिकार का क्या होगा ?
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                               सेव इंडिया फैमली फाउनडेशन की आपत्तियां 
१. शादी पुरुष के लिए विषम स्थितियों का निर्माण करती है. अगर सरकारी आंकड़ो पर नज़र डाली जाएँ तो आप पायेंगे शादी शुदा मर्द आत्महत्या के आंकड़ो में सबसे ऊपर है. आत्महत्या की दर पतियों की पत्नियों के आत्महत्या की दर से चार गुना अधिक है. हर नौ मिनट में एक शादी शुदा मर्द आत्महत्या करता है. इससें ये अंदाज़ा लगाना सरल है कि एक बिखरी हुई शादी कितनी तकलीफें लेके आती है और अब अगर तलाक प्रक्रिया को भी खर्चीला और जटिल बना दिया जाए तो ये तय है कि आत्महत्या की दर और बढ जायेगी पतियों की. क्या भारत सरकार शादी शुदा मर्दों के आत्महत्या की दर को बढ़ाने का इरादा रखता है ?
२. माट्रीमोनिअल प्रापर्टी कानून २०१२  भी विवाह अधिनियम में शामिल होने वाला है जिसके तहत शादी होते ही पत्नी को पति की जायदाद में सह भागीरदार मान लिया जाएगा. सो इस बात को समझना मुश्किल है कि इस नवीन संशोधन में आधी सम्पति को पत्नी के नाम कर देने कि क्या आवश्यकता थी ? ये बिल्कुल तय है कि सरकार पुरुष विरोधी कानून की हिमायती है और शादी एक पैसा वसूलने का सबसे बड़ा हथियार बन गया है मर्दों से.
३. कानून बनाने की प्रक्रिया एक लोकतान्त्रिक प्रक्रिया है जिसमे सब पक्षों की बात सुनी जाती है. लेकिन ये बेहद अफ़सोस की बात है कि इस नवीन संशोधन से जुडी तमाम आपत्तियों  जो पुरुष संघटनो ने रखी थी बिना किसी जायज तर्कों के पैनल द्वारा सिरे से खारिज कर दिया गया.
४. दहेज़ अधिनियम के तहत किसी भी प्रकार के कैश का लेन देन जुर्म है. लेकिन इस संशोधन के मुताबिक  “महिला की आर्थिक सुरक्षा” के ध्यान में रखते हुए पुरुष को एक मोटी रकम चुकानी पड़ेगी. एक प्रकार से ये दहेज़ का क़ानूनीकरण है फर्क इतना है कि पति को पैसा देना पड़ रहा है आर्थिक सुरक्षा के नाम पर.
५. ये संशोधन बराबरी के अधिकार की धज्जिया उडाता है क्योकि पुरुष को अपील के अधिकार से वंचित रखा गया है.
६. ये बात बिल्कुल बेमानी है और फेमिनिस्ट दुष्प्रचार है कि तलाक के बाद महिलाओ के पास छत नहीं रहती रहने के लिए. ये सरासर गलत बात है . ये सरकार से जानना है कि किन सर्वे के तहत इस बात का खुलासा हुआ है कि तलाक के बाद स्त्रिया घर विहीन हो जाती है ? ऐसे भ्रामक तथ्यों  के आधार पर कानून बनाना समाज के लिए खतरनाक है. ये भी देखना आवश्यक ही कि परिवार सयुंक्त था या एकल था ?
                                  सेव इंडिया फैमली फाउनडेशन की मांगे 
१. शादी और तलाक को संपत्ति के लेन देन का  ब्यूरो ना बनाये. ये एक पवित्र रिश्ता है जो परस्पर प्रेम के आदान प्रदान के लिए बना है ना कि संपत्ति के बटवारे के लिए.
२. अगर संपत्ति का बटवारा ही करना है तो कम से कम पत्नी के  पैत्रक संपत्ति को भी इस बटवारे में शामिल किया जाए.
 ३. शादी के अवधि पर विचार किया जाए.  कानून बनाने वालो को बीस साल और दो महीने की शादी का फर्क साफ़ साफ़ पता होना चाहिए.
४. अगर पति के सर पर किसी प्रकार के कर्जे की देनदारी बनती है, कोई फिक्स इंस्टालमेंट लोन वगैरह का बनता है तो इसके चुकता करने  की जिम्मेदारी पत्नियों की बराबर की मानी जाए.  अगर पत्नी कमाऊ नहीं है तो उसके पैत्रक संपत्ति में से देनदारी सुनिश्चित की जाए.
५. दोनों वर्गों को मतलब पत्नी और पति दोनों को डाइवोर्स याचिका को विरोध करने का समान अधिकार हो.
६. संपत्ति बटवारे में इस बात को सुनिश्चित किया जाए की संपत्ति अर्जन में दोनों का बराबर का सहयोग हो आर्थिक और सामाजिक स्तर पर और इस बात का ख्याल रखा जाए कि उसी संपत्ति का विभाजन हो जो शादी के बाद कमाए गए पैसो से अर्जित की गयी हो.
७. भारतीय कोर्ट को कम से कम डाइवोर्स प्रक्रिया में  निहित संपत्ति के लेन देन के निस्तारण के अधिकार से वंचित किया जाए. ये देखा गया है कि भरण पोषण के मामलो में कोर्ट का रवैय्या बहुत अविवेकपूर्ण रहता है. लिहाजा पति लोगो को इस बात पे कम ही भरोसा है कि संपत्ति का निस्तारण इस संशोधन के तहत जिम्मेदारी से होगा.  भरण पोषण के मामले में भत्ता गुज़ारा देना पति कि अनिवार्यता बन जाती है चाहे वो लोन देके दे या अपने गुर्दे बेच कर दे !!
८. पुरुषो के समस्याओ पर गंभीर रूप से विचार करने के लिए महिलाओं के आयोग के समान ही राष्ट्रीय पुरुष आयोग का गठन किया जाए.   इसका काम पुरुषो से जुड़े तमाम समस्याओ और पहुलुओ का बारीक और गंभीर अध्यन करके पुरुषो के  बेहतरी के लिए योजनाये बनायी जाए.
अगर भारत सरकार इन मांगो  पर सकारात्मक रवैया  दिखा पाने में विफल रहती है तो यही सन्देश पुरुष संघटन पुरुषो को देना चाहेंगे,  जो बेचारे कोल्हू के बैल की तरह हर समस्याओ में अपने को शामिल किये रहते है , पिसते रहते है , कि :
          आप के द्वारा खून पसीना बहाकर जो संपत्ति आप के पास आई है, कमाई गयी है, उस पर आपका कोई अधिकार नहीं है. 

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