मातृभाषा में शिक्षा की बने नीति : उपराष्ट्रपति श्री नायडू

भोपाल, 16 मई। भारत के उपराष्ट्रपति श्री वैंकैया नायडू ने कहा कि देशभर में संचालित पाठ्यक्रम भारतीय भाषाओं में होने चाहिए। यह असंभव नहीं है। प्रयास करेंगे तो संभव होगा। भाषा और भावनाएं साथ-साथ चलती हैं। मातृभाषा में ही अपनी भावनाएं अच्छे से अभिव्यक्त होती हैं। दूसरी भाषाएं सीखने से दिक्कत नहीं है, लेकिन मातृभाषा पहले सीखनी चाहिए। मातृभाषा ‘आँख’ है और दूसरी भाषा ‘चश्मा’ है। यदि आँख ही नहीं होगी तो चश्मे का कोई उपयोग नहीं है। माननीय उपराष्ट्रपति एवं विश्वविद्यालय के कुलाध्यक्ष श्री नायडू माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के तृतीय दीक्षांत समारोह को संबोधित कर रहे थे। दीक्षांत समारोह का आयोजन विधानसभा परिसर में स्थिति मानसरोवर सभागृह में किया गया। इस अवसर पर महापरिषद के अध्यक्ष एवं मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान, विधानसभा अध्यक्ष श्री सीतासरन शर्मा, जनसंपर्क मंत्री डॉ. नरोत्तम मिश्रा, सांसद श्री आलोक संजर और कुलपति श्री जगदीश उपासने उपस्थित रहे।

            उपराष्ट्रपति एवं कुलाध्यक्ष श्री नायडू ने अपनी विदेश यात्रा का उल्लेख करते हुए कहा कि लैटिन अमेरिका के देश में लोग अपनी मूलभाषा भूल गए हैं, उसकी जगह स्पेनिश आ गई है। भारत में भी अंग्रेजों ने इस प्रकार का प्रयास किया, किंतु महान शक्ति के कारण हमारी भाषाएं बच गईं। अभी खतरा बरकरार है। यदि हमने आने वाली पीढ़ी को मातृभाषा से नहीं जोड़ा तो दिक्कत होगी। हमें घर में बच्चों से मातृभाषा में बात करनी चाहिए। शिक्षा में मातृभाषा को अनिवार्य करना चाहिए। हमें गंभीरता से अपनी भाषाओं में शिक्षा देने की नीति बनानी चाहिए। उन्होंने कहा कि प्रत्येक व्यक्ति को माँ, मातृभूमि और मातृभाषा को कभी नहीं भूलना चाहिए। उपराष्ट्रपति श्री नायडू ने मीडिया एवं आईटी के क्षेत्र में अच्छे प्रोफेशनल्स देने के लिए विश्वविद्यालय की सराहना की। उन्होंने कहा कि पत्रकारिता एवं कम्प्यूटर शिक्षा में विश्वविद्यालय के श्रेष्ठ योगदान से मध्यप्रदेश को ई-गवर्नेंस में अग्रणी स्थान प्राप्त करने में सहायता मिली है।

भेदभाव समाप्त कर आगे बढऩा होगा : उपराष्ट्रपति ने कहा कि देश बदल रहा है। देश मजबूत कदमों से बढ़ रहा है। सामाजिक जागरण भी हो रहा है। इस समय में युवाओं की महत्वपूर्ण भूमिका है। सकारात्मक विचार से हमें अपना योगदान करना चाहिए। एक समय में भारत विश्वगुरु था। तक्षशिला और नालंदा में दुनिया से पढऩे के लिए लोग आते थे। अब फिर से अवसर आया है कि हम देश को वैश्विक शक्ति बना सकते हैं। उन्होंने कहा कि हमें सब प्रकार के भेदभाव समाप्त कर आगे बढऩा चाहिए। जाति के आधार पर होने वाले भेदभाव को जल्द से जल्द समाप्त करना होगा। महिलाओं के साथ होने वाला अत्याचार दु:खद है। हमारे देश में महिलाओं का बहुत सम्मान रहा है। हम अपने देश को ‘भारतमाता’ कहते हैं, ‘भारतपिता’ नहीं। नदी और प्रकृति को भी माँ के रूप में मान्यता है। शिक्षा, अर्थ और शक्ति की आराध्या देवी हैं। उन्होंने कहा कि महिलाओं का सशक्तिकरण बिल से नहीं पॉलिटिकल विल और एडमिनिस्ट्रेटिव स्किल से होगा। बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ आज की आवश्यकता है। उन्होंने अपनी जर्मन यात्रा का उल्लेख करते हुए बताया कि वहाँ वेद-उपनिषद के ज्ञान पर अनुसंधान हो रहा है, किंतु हम उन्हें पुराना कह कर उपेक्षित करते हैं।

विकास को गति देने में मदद करे मीडिया : उपराष्ट्रपति श्री नायडू ने कहा कि संसद में अच्छे काम होते हैं, लेकिन हंगामा मीडिया में महत्व प्राप्त करता है। आवश्यकता है कि मीडिया अच्छे कार्य को महत्व दे। जो सांसद अध्ययन कर प्रश्न पूछते हैं और जो मंत्री उनका अच्छे से जवाब देते हैं, उनको समाचार में प्रमुखता से स्थान देने की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि मीडिया देश के विकास को गति देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। उन्होंने बताया कि लोकतंत्र की मजबूती के लिए सदन का चलना आवश्यक है। चार ‘सी’ का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि कास्ट, कम्युनिटी, कैश और क्रिमिनलिटी यदि राजनीति में प्रभावी होगी तो लोकतंत्र कमजोर होगा। इसलिए दूसरी चार ‘सी’ – कैरेक्टर, कैपेसिटी, कलीबर और कन्डक्ट पर ध्यान देना होगा।

देश के नवनिर्माण में भूमिका निभाए पत्रकार : मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान

विश्वविद्यालय की महापरिषद एवं प्रदेश के मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि पत्रकारिता के क्षेत्र में विश्वविद्यालय ने श्रेष्ठ कार्य किया है। विश्वविद्यालय से निकले पत्रकारों ने नैतिकता के नये मानदण्ड स्थापित किए हैं। उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालय ने यह कार्यक्रम भारतीय वेश-भूषा और हिंदी में सम्पन्न कर अभिनंदनीय कार्य किया है। मुख्यमंत्री श्री चौहान ने कहा कि भारत में पत्रकारों ने स्वतंत्रता का आंदोलन चलाया है। आजादी के बाद पत्रकारों ने भारत के नवनिर्माण में भूमिका निभाई। तीसरे दौर में आपातकाल आया, तब पत्रकारों ने अभिव्यक्ति की आजादी की लड़ाई लड़ी। वर्तमान में मीडिया में व्यावसायिकता हावी हो रही है। आज मीडिया के सामने संतुलन बना कर चलने की चुनौती है। उन्होंने कहा कि पत्रकार सिर्फ पत्रकार नहीं होता, वह समाज सुधारक भी होता है।

वरिष्ठ पत्रकार एमजी वैद्य, अमृतलाल वेगड़ और महेश श्रीवास्तव को विद्या वाचस्पति (डी.लिट.) की मानद उपाधि : दीक्षांत समारोह में वरिष्ठ पत्रकार श्री एमजी वैद्य, श्री अमृतलाल वेगड़ और श्री महेश श्रीवास्तव को विद्या वाचस्पति की मानद उपाधि प्रदान की गई। मंच पर उपराष्ट्रपति श्री वैंकैया नायडू ने श्री महेश श्रीवास्तव को विद्या वाचस्पति से सम्मानित किया। श्री वेगड़ की स्थान पर उनके पुत्र श्री शरद वेगड़ ने उपाधि प्राप्त की। तृतीय दीक्षांत समारोह में 27 पीएचडी, 39 एमफिल और 202 स्नातकोत्तर उपाधि प्रदान की गईं। कुलपति श्री जगदीश उपासने ने उपाधि प्राप्त करने वाले सभी विद्यार्थियों को दीक्षोपदेश दिलाया। कुलाधिसचिव श्री लाजपत आहूजा ने प्रशस्ति पत्र पढ़े और धन्यवाद ज्ञापन किया। समारोह का संचालन कुलसचिव प्रो. संजय द्विवेदी और सहायक कुलसचिव श्री विवेक सावरीकर ने किया।

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