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Category: Chanakya Quotes

दुर्जन को वश में करने के लिए तलवार का सहारा लेना पड़ता है : आचार्य चाणक्य

सप्तमोऽध्यायः हस्ती अङ्कुशहस्तेन वाजी हस्तेन ताडयते। श्रृङ्गी लगुडहस्तेन खड्गहस्तेन दुर्जनः॥८॥ शब्दार्थ*   :— *हस्ती*= हाथी *अङ्गकुशहस्तेन*= हाथ में पकड़े हुए अंकुश से *वाजी*= घोड़ा *हस्तेन*= हाथ में लिए
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पुराणों के हिसाब से ज्ञान जिससे भी मिले उसे प्रेमपूर्वक स्वीकार करें : आचार्य चाणक्य

षष्ठोऽध्याय सिंहदेकं     वकादेकं     शिक्षेच्चत्वारि    कुक्कुटात्। वायसात्पञ्च शिक्षेच्च षट् शुनस्त्रीणि गर्दभात्॥१४॥ *शब्दार्थ*   :— मनुष्य को *सिंहात्*= सिंह, शेर से *एकम्*= एक गुण *वक्रात्*= बगुले से *एकम्*= एक गुण *कुक्कुटात्*=
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जो मित्रअविश्वासी, कपटी और दुष्ट हे, उसकी मित्रता की अपेक्षा मित्रहीन रहना अधिक उचित है : आचार्य चाणक्य

षष्ठोऽध्याय वरं न राज्यं न कुराजराज्यं, वरं न मित्रं न कुमित्रमित्रम्। वरं न शिष्यो न कुशिष्यशिष्यो, वरं न दारा न कुदारदाराः॥१२॥ *शब्दार्थ*  :— *राज्यम्*= राज्य का *न*=  न
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आचार्य चाणक्य द्वारा व्यक्तियों को वश में करने का उपाय

षष्ठोऽध्याय लुब्धमर्थेन    गृह्णीयात्    स्तब्धञ्जलिकर्मणा। मूर्खं छन्दोऽनुवृत्तेन यथार्थत्वेन पण्डितम्॥११॥ *शब्दार्थ*   :— *लुब्धम्*= धन-लोलुप, लोभी मनुष्य को *अर्थेन*= धन के द्वारा *गृह्णीयात्*= वश में करना चाहिए *स्तब्धम्*= अहंकारी, अभिमानी को
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मनुष्य के वास्तविक शत्रु कौन हैं : आचार्य चाणक्य

षष्ठोऽध्याय ऋणकर्ता पिता शत्रुः माता च  व्यभिचारिणी। भार्या रूपवती शत्रुः पुत्रः शत्रुरपण्डितः॥१०॥ *शब्दार्थ*   :—  *ऋणकर्ता*= ऋण लेने वाला *पिता*= पिता *शत्रुः*= शत्रु होता है *च*= और *व्यभिचारिणी*= व्यभिचार
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जानिए काल के बारे में आचार्य चाणक्य क्या कहते हैं ?

षष्ठोऽध्याय कालः   पचति  भूतानि  कालः  संहरते  प्रजाः। कालः सुप्तेषु जागर्ति कालो हि दुरतिक्रमः॥६॥ *शब्दार्थ*   :— *कालः*= काल, समय *भूतानि*= सब प्राणियों को *पचति*= पकाता है, जीर्ण करता है,
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