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Category: Education

पढ़िये जीवन और मृत्यु से सम्बन्धित गूढ़ कथन को आचार्य चाणक्य ने कितने सरलता से समझाया

दशमोऽध्याय आचार्य चाणक्य कहते हैं          एकवृक्षसमारूढा नाना वर्णा विहङ्गमाः। प्रभाते दिक्षु दशसु का तत्र परिवेदना॥१५॥ *शब्दार्थ*   :—  *नानावर्णाः*= विविध रंग और रूपों के *विहङ्गमाः*= पक्षी *एकवृक्ष-समारूढाः*= एक
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जानिए आचार्य चाणक्य ने क्यों कहा था कि पृथ्वी पर ब्राह्मण अमर वृक्ष का रूप है

  दशमोऽध्याय आचार्य चाणक्य कहते हैं।             विप्रो वृक्षस्तस्य मूलं च सन्धया,                    वेदाः शाखा
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शत्रुओं से द्वेष होने पर प्राणों के साथ-साथ धन की भी हानि होती है : आचार्य चाणक्य

  दशमोऽध्यायः आचार्य चाणक्य कहते हैं            आत्मद्वेषाद्     भवेन्मृत्युः    परद्वेषाद्  धनक्षयः। राजद्वेषाद् भवेन्नाशो ब्रह्मद्वेषात् कुलक्षयः॥१२॥ *शब्दार्थ*   :— *आत्मद्वेषाद्*= अपनी आत्मा
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