370 नहीं अनुच्छेद 35A है कश्मीर समस्या की असली जड़

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कृष्णकांत शर्मा बीकानेर
के के शर्मा
कृष्णकांत शर्मा बीकानेर
कृष्णकांत शर्मा बीकानेर

कृष्णकांत शर्मा बीकानेर : जम्मू कश्मीर हमारा है। भारत का अभिन्न अंग है और भारत का मस्तक भी और हमारे शान का प्रतिक भी। लेकिन जम्मू कश्मीर हमारा सबकुछ होते हुए भी हम जम्मू कश्मीर के नहीं है। जम्मू कश्मीर ख़ास है। सबके लिए नहीं।आखिर यह ख़ास क्यों है ? हम यहाँ जमीं क्यों नहीं खरीद सकते ? यहाँ के नागरिक क्यों नहीं बन सकते? बहुत कम लोगों को पता है कि अनुच्छेद 35(a) धारा 370 का ही हिस्सा है। इस धारा की वजह से कोई भी दूसरे राज्य का नागरिक जम्मू-कश्मीर में ना तो संपत्ति खरीद सकता है और ना ही वहां का स्थायी नागरिक बनकर रह सकता है। 1956 में जम्मू कश्मीर का संविधान बनाया गया था। इसमें स्थायी नागरिकता को परिभाषित किया गया है। इस संविधान के मुताबिक स्थायी नागरिक वो व्यक्ति है जो 14 मई 1954 को राज्य का नागरिक रहा हो या फिर उससे पहले के 10 वर्षों से राज्य में रह रहा हो। साथ ही उसने वहां संपत्ति हासिल की हो। पिछले कई सालों से जम्‍मू-कश्‍मीर में धारा 35(a) हटाने की बात भर पर बवाल मचा हुआ है। इधर की राजनीति कुछ ज्यादा ही तेवर में हैं। कट्टरप‍ंथयों के साथ-साथ राजनीतिक दलों को भी ये बात पच नहीं रही है। जम्मू-कश्मीर की सीएम महबूबा मुफ्ती ने संविधान के अनुच्छेद 35(A) में बदलाव के मुद्दे को उठाते हुए चेतावनी दी है कि अगर इसमें बदलाव होता है तो कश्‍मीर में तिरंगे की सुरक्षा के लिए कोई आगे नहीं आएगा। नेशनल कांफ्रेंस अध्यक्ष और लोकसभा सांसद फारूक अब्दुल्ला ने तो यहां तक कह दिया है कि संविधान की धारा 35(a) को रद्द किए जाने पर ‘जनविद्रोह’ की स्थिति पैदा होगी।यह विवाद खड़ा हुआ सुप्रीम कोर्ट में दायर उस याचिका के कारन जिसमे संविधान के अनुच्छेद 35(a) और अनुच्छेद 370 को यह कहते हुए चुनौती दी गई है कि इन प्रावधानों के चलते जम्मू-कश्मीर सरकार राज्य के कई लोगों को उनके मौलिक अधिकारों तक से वंचित कर रही है। सर्वोच्च न्यायालय ने इस याचिका पर सुनवाई के लिए तीन जजों की एक पीठ गठित करने की बात कही है जो छह हफ़्तों के बाद इस पर सुनवाई शुरू करेगी।वी द सिटिजंस’ नामक एनजीओ द्वारा इस याचिका को चुनौती दी गयी।इस अनुच्छेद के अनुसार जो जम्मू-कश्मीर राज्य का रहने वाला नहीं है वह वहां पर जमीन नहीं खरीद सकता, वह वहां पर रोजगार नहीं कर सकता और वह वहां पर निवेश नहीं कर सकता। अब इसकी आड़ में भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14, 17, 19 एवं 21 में भारतीय नागरिकों को समानता और कहीं भी रहने के जो अधिकार दिए, वह प्रतिबंधित कर दिए गए। बहुत से लोग हैं जो यह मानते हैं की धारा 370 को समाप्त कर देने कश्मीर की लगभग सारी समस्याएँ समाप्त हो जायेंगी। किन्तु यह अधूरा सत्य है व्यवहार में धारा 370 इतना घातक नहीं जितना की 35(a) है।

आइये इस विवाद के बारे में कुछ जानकारी ले लें।

आपको जानकर हैरानी होगी कि संविधान की किताबों में न मिलने वाला अनुच्छेद 35(a) जम्मू-कश्मीर की विधान सभा को यह अधिकार देता है कि वह ‘स्थायी नागरिक’ की परिभाषा तय कर सके. दरअसल, संविधान के अनुच्छेद 35(a) , को 14 मई 1954 में राष्ट्रपति के आदेश से संविधान में जगह मिली थी। संविधान सभा से लेकर संसद की किसी भी कार्यवाही में, कभी अनुच्छेद 35(a) को संविधान का हिस्सा बनाने के संदर्भ में किसी संविधान संशोधन या बिल लाने का जिक्र नहीं मिलता है। अनुच्छेद 35(a) को लागू करने के लिए तत्कालीन सरकार ने धारा 370 के अंतर्गत प्राप्त शक्ति का इस्तेमाल किया था.अनुच्छेद 35(a) से जम्मू-कश्मीर सरकार और वहां की विधानसभा को स्थायी निवासी की परिभाषा तय करने का अधिकार मिलता है। इसका मतलब है कि राज्य सरकार को ये अधिकार है कि वो आजादी के वक्त दूसरी जगहों से आए शरणार्थियों और अन्य भारतीय नागरिकों को जम्मू-कश्मीर में किस तरह की सहूलियतें दे अथवा नहीं दे। 14 मई 1954 को तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने एक आदेश पारित किया था. इस आदेश के जरिए भारत के संविधान में एक नया अनुच्छेद 35(a) जोड़ दिया गया। अनुच्छेद 35(a) के मुताबिक अगर जम्मू-कश्मीर की कोई लड़की किसी बाहर के लड़के से शादी कर लेती है तो उसके सारे अधिकार खत्म हो जाते हैं। साथ ही उसके बच्चों के अधिकार भी खत्म हो जाते हैं. इस अनुच्छेद को हटाने के लिए एक दलील ये दी जा रही है कि इसे संसद के जरिए लागू नहीं करवाया गया था। दूसरी दलील ये है कि देश के विभाजन के वक्त बड़ी तादाद में पाकिस्तान से शरणार्थी भारत आए। इनमें लाखों की तादाद में शरणार्थी जम्मू-कश्मीर राज्य में भी रह रहे हैं। जम्मू-कश्मीर सरकार ने अनुच्छेद 35(a) के जरिए इन सभी भारतीय नागरिकों को जम्मू-कश्मीर के स्थायी निवासी प्रमाणपत्र से वंचित कर दिया। इन वंचितों में 80 फीसद लोग पिछड़े और दलित हिंदू समुदाय से हैं। इसी के साथ जम्मू-कश्मीर में विवाह कर बसने वाली महिलाओं और अन्य भारतीय नागरिकों के साथ भी जम्मू-कश्मीर सरकार अनुच्छेद 35(a) की आड़ लेकर भेदभाव करती है।

अनुच्छेद 370 की वजह से जन्मे अनुच्छेद 35(a) का दंश आज सब से ज्यादा कोई झेल रहा है तो वह है 1947 में पश्चिमी पाकिस्तान से आए दस लाख शरणार्थी। ये लोग राज्य में 70 वर्षों से रह रहे हैं परंतु उन्हें वहां स्थायी निवासी के अधिकार नहीं हैं। वे राज्य में जमीन नहीं खरीद सकते, उनके बच्चे को सरकारी नौकरी नहीं मिल सकती, उन्हें व्यावसायिक शिक्षण संस्थानों में प्रवेश नहीं मिल सकता। उनको जम्मू-कश्मीर राज्य कोई अधिकार नहीं देता। वे लोकसभा चुनावों में तो वोट डाल सकते हैं, लेकिन विधान सभा एवं अन्य स्थानीय चुनावों में न वोट डाल सकते हैं न ही लड़ हो सकते हैं। दो पीढ़ियां गुजर गईं, 70 वर्ष हो गए लेकिन वे लोग आज भी शरणार्थियों का जीवन जीने को मजबूर हैं। अगर भारतीय संविधान के अनुच्छेद 370 और 35(a) नहीं होते तो पश्चिम पाकिस्तान से आए लोगों को आज राज्य में पूरे अधिकार मिलते।आज पूरे देश में दलित अधिकारों को लेकर हाहाकार मची है। दलितों के शोषण के विरोध में बहुत से तथाकथित मानवाधिकार एवं दलित अधिकार कार्यकर्ता पूरे देश में सक्रिय हैं। परंतु जम्मू-कश्मीर में दलितों के साथ दशकों से हो रहे अन्याय के विरूद्ध वे भी आवाज़ नहीं उठाते। 1970 के दशक में प्रदेश सरकार द्वारा विषेश आग्रह पर बुलाए जाने पर पंजाब से सैंकड़ों दलित परिवार जम्मू-कश्मीर की सफाई के लिए यहां आए थे। दो पीढ़ियां बीतने के बाद इनकी संख्या हज़ारों में हो गई है और अनुच्छेद 35(a) की वजह से वे आज तक राज्य के स्थायी निवासी नहीं बन पाए। सब से बड़ा शोषण जम्मू-कश्मीर के दलितों के साथ इस असंवैधानिक अनुच्छेद, अनुच्छेद 35(a) ने यह किया कि ये लोग सफाई कर्मचारी के अलावा कोई अन्य काम भी नहीं कर सकते। अनुच्छेद 35(a) की वजह से इनके बच्चे व्यावसायिक शिक्षण संस्थानों में प्रवेश नहीं ले सकते, यदि वह निजी शिक्षा पाकर किसी और क्षेत्र में अपना कैरियर बनाना चाहते हैं तो जम्मू-कश्मीर राज्य में उन्हें इसकी अनुमति नहीं है क्योंकि वे केवल सफाई कर्मचारी की नौकरी के अलावा राज्य में कोई अन्य सरकारी नौकरी के लिए आवेदन तक नहीं कर सकते। जम्मू-कश्मीर राज्य से बाहर रहने वालों के साथ तो अनुच्छेद 35(a) की वजह से भेदभाव हो ही रहा है, साथ ही स्वतंत्रता के समय से यहां रहने वाले लाखों लोग भी इसका दंश झेल रहे हैं।1947 से 1960 के बीच आकर जम्मू में बसे इन समुदायों की तीसरी और चौथी पीढ़ी अब यहां रह रही है, लेकिन अब तक उनके पास अधिकार नहीं हैं। जब विधानसभा और पंचायतों में प्रतिनिधित्व ही नहीं तो फिर उनके विकास की बात कौन करेगा?

370 और अनुछेद 35(A) के कारण राज्य की शेष देश से दूरी बढ़ने, विकास के बाधित होने, विस्थापितों और शरणार्थियों के संविधानप्रदत्त मौलिक अधिकारों से वंचित ,अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, पिछड़े वर्ग, महिलाओं, तथा अल्पसंख्यकों के लिये भारतीय संविधान मेंकिये गये संरक्षणात्मक प्रावधान तथा आरक्षण की सुविधा से भी राज्य की बड़ी जनसंख्या वंचित है। 370 और अनुछेद 35(A) पर क्षेत्रीय और मजहबी पहचान का लबादा डाल कर अलगाव की राजनीति को धार दी जाती रही है। राज्य को यदि विकास के रास्ते पर आगे बढ़ना है तो उसके लोकतांत्रिक उपायों से मुंह मोड़ना असंभव है। इसके लिए जनता के हाथों पंचायती राज सौंपना होगा, केन्द्रीय मानवाधिकार आयोग, केन्द्रीय अल्पसंख्यक आयोग, केन्द्रीय महिला आयोग, केन्द्रीय अनुसूचित जाति आयोग, केन्द्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग, लोकसभा विधानसभा हेतु परिसीमन आयोग तथा सर्वोच्च न्यायालय आदि के लिये दरवाजे खोलने होंगे ताकि कोई भी नागरिक अपने अधिकारों के लिये सीधे इन संस्थाओं तक पहुंच सके।जम्मू-कश्मीर किसी भी अन्य राज्य की तरह भारतीय संघ का अभिन्न अंग है। वहां का प्रत्येक निवासी भारतीय नागरिक है और उसे वे सभी अधिकार हासिल हैं जो भारत के किसी भी नागरिक को हैं। संविधान का कोई भी प्रावधान उसे मौलिक अधिकार प्राप्त करने से रोक नहीं सकता। किन्तु 370 और अनुछेद 35(A) की आड़ में अनेक बार नागरिकों के मौलिक अधिकारों पर चोट होता है जिसका संवैधानिक हल खोजा जाना समय की मांग है।

मजे की बात ये है की यदि आप संविधान की किसी भी प्रमाणिक पुस्तक को पढेंगे तो आपको यह धारा शायद कहीं दिखायी न दे.आपको अनुच्छेद 35(a) अवश्य पढ़ने को मिलेगा पर 35A ढूंढने के लिए आपको संविधान की (एपेंडिक्स) पर नजर डालनी होगी। यदि इसे संवैधानिक ‘चोरी’ कहा जाए तो अतिश्योक्ति नहीं होगी। यह आर्टिकल संविधान के मूलभूत ढाँचे के खिलाफ है,जिसमें संसद भी संशोधन नहीं कर सकती है। इसलिए यह अनुच्छेद पूर्णतः असंवैधानिक है आर्टिकल 370 से पहले अनुच्छेद 35A को हटाया जाना बेहद जरुरी है।

के के शर्मा

नवल सागर कुंआ

बीकानेर

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