यदि स्वामी दयानन्द और स्वामी श्रद्धानन्द न होते तो स्वामी रामदेव भी न होते : स्वामी रामदेव

तीन दिवसीय गुरुकुल सम्मेलन, गुरुकुल कांगड़ी परिसर में 6 जुलाई, 2018 को आरम्भ हुआ। अपरान्ह 4 बजे से सम्मेलन का उद्घाटन समारोह हुआ जिसे पतंजलि योगपीठ के विश्व विख्यात योगाचार्य स्वामी रामदेव जी, मेघालय के राज्यपाल ऋषिभक्त श्री गंगा प्रसाद जी एवं कई आर्य संन्यासी एवं नेताओं ने सम्बोधित किया। स्वामी रामदेव जी ने ऋषि दयानन्द को श्रद्धांजलि देते हुए अपने सम्बोधन के आरम्भ में तीन नारे लगाये ‘सत्य सनातन वैदिक धर्म की जय, महर्षि दयानन्द जी की जय और भारत माता की जय।’ सम्बोधन के आरम्भ में स्वामी रामदेव जी ने कहा कि यदि महर्षि दयानन्द और स्वामी श्रद्धानन्द न होते तो स्वामी रामदेव भी न होते। उन्होंने कहा कि आज दुनियां वाले कहते हैं कि अब आक्सफोर्ड व हावर्ड वाले पीछे छूट गये हैं और गुरुकुल वाले उनसे आगे बढ़ गये हैं। स्वामी रामदेव जी ने कहा कि हम ऋषि परम्परा और आर्य मान्यताओं को मानते हैं। स्वामी जी ने कहते व चाहते हैं वैसा ही हो जाता है। उन्होंने कहा कि हम वेद को मानने वाले हैं। आर्यसमाज एक हो जायेगा तो दुनिया से पाखण्ड व अन्धविश्वासों का अन्त हो जायेगा। स्वामी रामदेव जी ने पिछले दिनों दिल्ली के पास 11 लोगों की आत्महत्याओं की चर्चा की और उस पाखण्ड व अन्ध-विश्वास का भी उल्लेख किया जिसके कारण 11 मानव जीवन नष्ट हो गये। उन्होंने कहा कि पाखण्ड एवं अन्ध विश्वासों का समाधान महर्षि दयानन्द जी की विचारधारा है। स्वामी रामदेव जी ने कहा कि देश के पाखण्डी एवं अंधविश्वासी लोग देश की पचास हजार करोड़ से अधिक की धन व सम्पत्ति प्रति वर्ष लूटते हैं। उन्होंने कहा कि आर्यसमाज के विद्वानों और ऋषि भक्तों को देश के लोगों को ईश्वर का सच्चा स्वरुप बताना चाहिये। सभी पाखण्डों एवं अंधविश्वासों का पूरे दम खम के साथ खण्डन करना चाहिये। ऋषिभक्त स्वामी रामदेव जी ने कहा कि पाखण्ड, अन्धविश्वास, नशाखोरी, मांसाहार आदि देश व समाज के शत्रु हैं। उन्होंने कहा कि आर्यसमाज का कोई अनुयायी मांसाहार, नशाखोरी, अश्लीलता और अन्धविश्वास के कार्य नहीं करता। आर्यसमाज को पूरे देश में नशाबन्दी का आन्दोलन चलाना चाहिये जिससे देश में एक भी व्यक्ति नशाखोरी करने वाला व्यक्ति न मिले।

स्वामी रामदेव जी ने आगाह करते हुए कहा कि दलितों, शोषितों, वंचितों को आर्यसमाज से लड़ाने की कोशिश की जा रहीं हैं। उन्होंने कहा कि केवल राजनैतिक आजादी से देश स्वतन्त्र नहीं हो जाता। उन्होंने कहा कि वैचारिक स्वतन्त्रता के साथ देश के नागरिकों को देश के इतिहास व ज्ञान से युक्त परम्पराओं का भी सम्मान भी करना चाहिये। स्वामी रामदेव जी ने कहा कि मैकाले की शिक्षा पद्धति ने देश को एक मशीन बना दिया है। हमें वेदों की शिक्षा से देश के लोगों का समग्र व दिव्य विकास करना है। उन्होंने कहा कि मनुष्य परमात्मा की श्रेष्ठ रचना है। उसे जाग्रत करने का काम शिक्षा का है। स्वामी जी ने बताया कि उन्होंने बचपन में ही आर्योद्देश्यरत्नमाला, सत्यार्थप्रकाश, संस्कारविधि आदि ऋषि दयानन्द के अनेक ग्रन्थों को कम से कम तीन बार पढ़ लिया था। फिर मैंने अध्ययन के लिए गुरुकुल की तलाश की। उन्होंने कहा कि लोगों से पूछता हुआ मैं गुरुकुल प्रभात आश्रम पहुंचा जहां मुझे कहा गया कि तुम्हारी उम्र दो वर्ष अधिक है। तुम्हें उस गुरुकुल में भर्ती नहीं किया जा सकता। मुझे गुरुकुल कालवां जाने को कहा गया। मैं वहां पहुंचा तो उन्होंने मेरी उम्र दो वर्ष कम बता कर मुझे प्रवेश देने से मना कर दिया। इसके बाद मैं गुरुकुल खानपुर गया। उन्होंने कहा कि वह मुझे तभी प्रविष्ट करेंगे जब वह मेरे माता-पिता को पत्र लिख कर उनकी स्वीकृति प्राप्त कर लेंगे। उन्होंने पत्र लिखा। स्वामी रामदेव जी ने कहा कि हमने ठान रखा था कि पढ़ना है तो गुरुकुल में ही पढ़ना है।

स्वामी रामदेव जी ने कहा कि गुरुकुल मानव जीवन निर्माण वा मनुष्य जीवन बनाने की श्रेष्ठ पद्धति है। गुरुकुलीय शिक्षा पद्धति से मानव जीवन का समग्र विकास होता है। उन्होंने कहा कि जो मनुष्य गुरुकुल पद्धति से दीक्षित हो गया वह देवत्व व ऋषित्व पर आरोहण करता है। स्वामी जी ने गुरुकुलों की चुनौतियों की भी चर्चा की। उन्होंने बताया कि वह प्रयासरत है जिससे गुरुकुलों की पाठ विधि क्या हो, इसका समाधान शीघ्र ही निकल जायेगा। उन्होंने बताया कि पाठ विधि का प्रश्न केन्द्र व राज्य के पृथक पृथक विषयों व अधिकारों के बीच उलझा हुआ है। उन्होंने कहा कि दो काम किये जा चुके हैं। कक्षा 5 से 12 तक अष्टाध्यायी, महाभाष्य, दर्शन आदि के समन्वय सहित आर्ष पाठ विधि की व्यवस्था। स्वामी जी ने कहा कि ऋषि दयानन्द जी की आर्ष पाठ विधि की हम हरिद्वार व उत्तराखण्ड में व्यवस्था कर देंगे। स्वामी जी ने श्रोताओं को आश्वस्त करते हुए कहा कि आगे 8-10 वर्षों में आप देखेंगे कि मैकाले के विकल्प के रुप में आर्ष शिक्षा पद्धति की व्यवस्था कर दी जायेगी। उन्होंने कहा कि मैं पिछले 8-10 वर्षों से इस काम में लगा हुआ हूं। स्वामी जी ने कहा कि मनुष्य का निर्माण हमारे गुरुकुलों की पाठ विधि से कम अपितु वहां की दिनचर्या और जीवन पद्धति से अधिक होता है। उन्होंने गुरुकुल में ब्रह्मचारियों के चार बचे शय्या त्याग करने, प्रार्थना मंत्र बोलने, व्यायाम व योग करने, सन्ध्या व यज्ञ करने, गुरु के सान्निध्य में रहने और सायं यज्ञ करने सहित रात्रि को मन्त्र बोल कर शयन करने की जीवन पद्धति को जीवन निर्माण का महत्वपूर्ण अंग बताया।

स्वामी जी ने प्रसन्नता व्यक्त करते हुए कहा कि मुझे यहां ब्रह्मचारियों से अधिक गुरुकुलों की ब्रह्मचारणियां नजर आ रही हैं। स्वामी जी ने कहा कि गुरुकुल हमारी मातृ संस्था है। उन्होंने कहा समय समय पर बालकृष्ण जी और मैं विचार करते हैं कि हम गुरुकुलों के लिए क्या कर सकते हैं। स्वामी जी ने इसी क्रम में उनके स्वदेशी अभियान की भी चर्चा की। उन्होंने विस्तार से बताया कि हमने विदेशी कम्पनियों को परास्त करके दिखाया है। उन्होंने कहा कि परमार्थ हमारे जीवन का लक्ष्य है। हमारा अर्थ भी परमार्थ के लिए ही होना चाहिये। स्वामी जी ने घोषणा की कि आगामी दिनों में वेदों पर आधारित शिक्षा व्यवस्था वाला एक विश्वविद्यालय वह देंगे जहां 1 लाख से अधिक ब्रह्मचारी व ब्रह्मचारणियां अध्ययन कर सकेंगी। उन्होंने कहा कि हम से जो बन पायेंगा वह श्रेय कर्म हम गुरुकुलों के लिए करेंगे। स्वामी जी ने गुरुकुलों के सामने उपस्थित आर्थिक चुनौतियों की भी चर्चा की। उन्होंने कहा कि मैं गुरुकुल में अकेला 40 विद्यार्थियों के लिए भिक्षा मांगकर लाता था। स्वामी जी ने बताया कि हमें गुरुकुलों के लिए व्याकरण के अच्छे विद्वान नहीं मिलते। हमने 500 ब्रह्मचारी व 500 ब्रह्मचारणियों को तैयार किया है। इतने ही विद्वान अब हम हर वर्ष तैयार करेंगे। स्वामी जी ने कहा कि गुरुकुल कांगड़ी अन्य धमावलम्बियों की तरह से आपका बहुत बड़ा तीर्थ है। उन्होंने कहा कि आर्यसमाज के लोगों को वर्ष में एक बार यहां अवश्य आना चाहिये और यहां सम्मेलन या विद्वानों की गोष्ठी, चिन्तन शिविर व मन्त्रणायें करनी चाहिये। इस कार्य में हमसे जो मदद हो सकती है वह हम करेंगे। स्वामी जी ने कहा कि अकेले आर्यसमाज, इसके संगठन व संस्थाओं ने देश की अन्य समस्त संस्थाओं व संगठनों से भी अधिक कार्य किया है। उन्होंने कहा कि आर्यसमाज में शौर्य और पराक्रम की कमी नहीं है। स्वामी जी ने कहा एक बालकृष्ण और स्वामी रामदेव जो कार्य कर सकता है, आर्यसमाज का लगभग 150 वर्ष पुराना संगठन उससे कहीं अधिक कार्य अवश्य कर सकता है।

स्वामी जी ने कहा कि आर्यसमाज विश्व का सबसे बड़ा आध्यात्मिक एवं सामाजिक संगठन है। उन्होंने कहा यदि आजादी के समय हम अपना एक राजनैतिक संगठन खड़ा कर लेते तो आज हमें दूसरे राजनीतिक दलों से अपनी मांगें पूरी करने के लिए प्रार्थना न करनी पड़ती। आज हम भीख मांगने की स्थिति में न होते। स्वामी जी ने कहा कि राजनीति शक्ति के बिना काम नहीं चलता। उन्होंने कहा कि हमें सरकार व राजनीतिक दलों से मांगना पड़ता है कि हमारे गुरुकुलों को मान्यता दे दो। हमें दूसरों से मांगना पड़े यह हमारे लिए धिक्कार है। इसके बाद स्वामी जी ने पंडित सत्यापाल पथिक जी का एक भजन पूरा गाकर सुनाया। भजन के बोल हैं ‘सूरज बन दूर किया पापों का घोर अन्धेरा, वह देव गुरु है मेरा, वह देव दयानन्द मेरा। मथुरा नगरी से उदय हुआ विरजानन्द का चेरा, वह देव गुरु है मेरा, वह देव दयानन्द मेरा।’ भजन के मध्य में ही स्वामी जी ने कहा कि आर्यसमाज के अतिरिक्त अन्य कोई संस्था देश में नहीं है जो वेद पढ़ाती हो। आर्यसमाज में स्त्रियों से भेदभाव नहीं है। इसका देश के स्तर पर प्रचार करने की जरुरत है। इसके बार भजन फिर जारी रहा। स्वामी जी ने इसी बीच पथिक जी को स्मरण कर कहा कि मैंने उन्हें यहां घूमते हुए देखा है। पथिक जी ने भजनों के माध्यम से आर्यसमाज व देश की बहुत बड़ी सेवा की है। मैं लगभग 80 प्रतिशत भजन उन्हीं के गाता हूं। पथिक जी जहां हों मंच पर आ जायें। यह बात उन्होंने दो तीन बार दोहराई। कुछ देर बाद पथिक जी मंच पर पहुंचे। इसी बीच स्वामी रामदेव जी ने घोषणा की वह पथिक जी के सम्मान में एक लाख रुपये की धनराशि देंगे। आप उनका यहां अच्छी प्रकार से अभिनन्दन करें। पथिक जी को स्वामी रामदेव जी ने और स्वामी आर्यवेश जी ने ओ३म् का पट्टा पहना कर सम्मानित किया और उन्हें मच पर स्थान देने के लिए कहा। इसके बाद पथिक जी मंच पर बैठे। हम जब प्रातः गुरुकुल पहुंचे तो भोजन के पण्डाल में पंडित सत्यपाल पथिक जी अपने पुत्र यशस्वी श्री दिनेश जी के साथ नाश्ता करते हुए दिखाई दिये। हमने उनसे आशीर्वाद लिया। उन्होंने हमारे व परिवार के सदस्यों के हालचाल पूछे। उनसे बातचीत कर हमने भी नाश्ता किया। थोड़ी देर में हम यज्ञशाला की ओर आये और स्थान देखकर बैठ गये। उसके कुछ देर बाद आदरणीय पथिक जी भी वहां आये हमारे साथ बैठ गये। वहां भी उनसे कुछ बातें हुई। वैदिक साधन आश्रम तपोवन देहरादून के मंत्री श्री प्रेमप्रकाश शर्मा जी भी हमारे निकट ही बैठे थे। हमने यज्ञ व मंच आदि के चित्र लिये। हमारे मन में विचार आया कि हम पथिक जी का भी एक चित्र लें और हमने उनका चित्र लिया। वह हम यहां प्रस्तुत कर रहे हैं।

पं. सत्यपाल पथिक जी का सम्मान होने के बाद स्वामी रामदेव जी का सम्बोधन जारी रहा। स्वामी जी ने कहा कि मैं दो चीजों को मानता हूं। आपके चेहरों पर सदा मुस्कान रहनी चाहिये। इसके बाद स्वामी जी ने ऋषि दयानन्द के चेहरे के भावों का किसी विद्वान लेखक द्वारा वर्णन किया। हम उनके कहे कुछ ही शब्द नोट कर सके। उन्होंने कहा ऋषि समुद्र की तरह भीतर से शान्त, बाहर से क्रियाशील, हिमालय की चोटियों में सबसे ऊंची चोटी पर बैठे हुए, ऐसे थे ऋषि दयानन्द। शायद इसी प्रकार के शब्द योगी अरविन्द जी ने भी कहे हैं। स्वामी जी ने पंथ निरपेक्षता की भी चर्चा की। उन्होंने कहा सेकुलरज्मि का किसी ने सच्चा दर्शन दिया है तो वह ऋषि दयानन्द ने दिया। ऋषि दयानन्द मनुष्य मात्र के प्रति कल्याण की भावना रखते थे। दूसरी बात स्वामी रामदेव जी ने यह बताई की सदा सर्वदा सबसे प्रीति किया करें। यह बात आप स्वामी दयानन्द जी से सीख लो। उन्होंने कहा कि स्वामी दयानन्द ने उन्हें जहर पिलाने वाले पाचक को भी माफ कर दिया था। अपने विषदाता को माफ करने वाला महर्षि दयानन्द दुनियां का अपूर्व मनुष्य था।

स्वामी जी ने कहा कि आर्यसमाज के लोगों की संख्या 4-5 करोड़ तो है ही। राजनीतिक दल आर्यसमाज की बात नहीं सुनते। उन्होंने कहा कि यदि आर्यसमाजी संगठित हों जायें तो राजनीतिक दल हमारी उपेक्षा नहीं कर सकेंगे। स्वामी जी ने कहा कि किसी भी संगठन में मतभेद हो सकते हैं। ‘मुंडे मुंडे मतिभिन्ना’ का उच्चारण किया। उन्होंने कहा कि किन्हीं विषयों पर मनुष्यों की मति अलग अलग हो सकती है। संगठन में सबको एक मन, मस्तिष्क व विचार वाला होना चाहिये। उन्होंने कहा कि हम वेद को मानते हैं। स्वामी जी ने संगठन सूत्र के दूसरे मंत्र ‘ओ३म् सं गच्छध्वं सं वदध्वं सं वो मनांसि जानताम्’ को पूरा बोल कर सुनाया। उन्होंने कहा कि ऋग्वेद का अन्तिम सन्देश ‘संगठन-सूक्त’ है। हममें संगठन व राष्ट्र निष्ठा होनी चाहिये। इसके लिए हमें व्यक्तिगत अहंकार को नीचे लाना पड़ेगा।

स्वामी रामदेव जी ने कहा कि अभी कुछ दिन पूर्व गुरुकुल सम्मेलन के लिए स्वामी आर्यवेश जी हमारे यहां आये थे और उसके बाद दिल्ली सम्मेलन के लिए श्री सुरेश अग्रवाल जी व श्री विनय आर्य आदि कुछ लोग भी आये। मैंने उनसे संगठन के हित में मतभेद दूर कर एकता करने के लिये निवेदन किया। उन्होंने अपनी ओर से मुझे इस कार्य को करने के लिए कहा। उन्होंने कहा कि आप जो कहेंगे हम उसे मानेंगे। उन्होंने कहा कि स्वामी आर्यवेश जी तो इसके लिए तैयार हो जायेंगे। स्वामी अग्निवेश मंच पर उपस्थित थे। स्वामी रामदेव जी ने स्वामी अग्निवेश जी को इस कार्य के लिए अपनी स्वीकृति देने का अनुरोध किया। अग्निवेश जी ने इस पर ताली बजाई। स्वामी जी ने कहा कि अग्निवेश जी ताली बजाकर अपनी स्वीकृति दे दी है। इस पर पूरे पण्डार ने हर्षध्वनि की। स्वामी रामदेव जी ने घोषणा की कि वह कोशिश करेंगे कि अक्तूबर, 2018 के दिल्ली आर्य महासम्मेलन से पूर्व हम सब एक हो जायें और उस सम्मेलन में हम सब एक साथ भाग लें। स्वामी रामदेव जी ने कहा कि हमारा जीवन दस, बीस अथवा पचास वर्ष का हो सकता है। हमारा राष्ट्र, हमारा धर्म व संस्कृति हमेशा रहेगी। स्वामी जी ने कहा कि हमारे कारण हमारे राष्ट्र का अहित नहीं होना चाहिये। उन्होंने अपना संकल्प प्रस्तुत करते हुए वेदमंत्र ‘ओ३म् इन्द्रं वर्धन्तोऽप्तुरः कृण्वन्तो विश्वमार्यम्। अपघ्नन्तो अराव्णः।’ बोला। इसके बाद उन्होंने ‘ओ३म् विश्वानि देव सवितर्दुरितानि परासुव। यद् भद्रन्तन्न आसुव’ का पाठ किया। उन्होंने कहा कि आप एक पल के लिए भी दुरित भावनाओं का आदर न करें। कभी अशुभ का आदर न करें। दुरित भावनाओं को अपने भीतर स्थान न दें। अपने वक्तव्य को विराम देते हुए उन्होंने कहा कि यदि एक-एक व्यक्ति अपने आप को स्वामी दयानन्द और स्वामी श्रद्धानन्द बना लें तो आर्यसमाज का कल्याण होगा। वक्तव्य पूरा होने पर पंडाल जो हजारों लोगों से पूरा भरा हुआ था, सब ने स्वामी रामदेव जी के इस सुन्दर व प्रभावशाली संबोधन के लिए बहुत देर तक करतल ध्वनि की। इसके बाद मेघालय के राज्यपाल श्री गंगा प्रसाद जी का सम्बोधन हुआ।

गुरुकुल सम्मेलन के उद्घाटन समारोह का आरम्भ अपरान्ह 4.00 बजे हुआ। आरम्भ में ‘जन गण मन अधिनायक जय हे भारत भाग्य विधाता’ राष्ट्र गान हुआ। इसके बाद मंगलाचरण हुआ। दीप प्रज्जवलन के बाद सभा प्रधान जी ने राज्यपाल महोदय जी को अंग वस्त्र देकर सम्मानित किया। स्वामी रामदेव जी और राज्यपाल महोदय का मंच पर उपस्थित कुछ विद्वानों ने सम्मान किया। कन्याओं के द्वारा एक स्वागीत भी हुआ। इसके बाद स्वामी आर्यवेश, स्वामी विवेकानन्द सरस्वती तथा स्वामी यतीश्वरानन्द सहित हरिद्वार के विधायक के संबोधन हुए। दक्षिण अफ्रीका आर्य प्रतिनिधि सभा के प्रधान श्री राम विलास जी ने स्वामी विवेकानन्द सरस्वती जी को कुछ वस्त्र भेंट किये। ओ३म् शम्।

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One Comment on “यदि स्वामी दयानन्द और स्वामी श्रद्धानन्द न होते तो स्वामी रामदेव भी न होते : स्वामी रामदेव”

  1. यह लेख व समाचार प्रकाशित करने के लिए आभार एवं धन्यवाद. सादर.

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