आखिर पं. दीनदयाल उपाध्याय के विचारों को जनता तक क्यों नहीं पहुंचाया गया ?

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के के शर्मा , बीकानेर : यह वर्ष देश के लिए दीनदयाल जन्म शताब्दी के रूप में मनाने का अवसर है।दुनिया में कई तरह के विचारक हुए। जिनके नाम की पहचान उनके कामों से हुई। इन्हीं विचारकों में से एक नाम पं. दीनदयाल उपाध्याय का भी था। पं. दीनदयाल उपाध्याय बहुप्रतिभा के धनी थे। वे एक भारतीयविचारक ही नहीं बल्कि अर्थशास्त्री, समाजशास्त्री इतिहासकार और पत्रकार भी थे। दीनदयाल उपाध्याय भारतीय जनसंघ के नेता और भारतीय राजनीतिक एवं आर्थिक चिंतन को वैचारिक दिशा देने वाले पुरोधा थे। यह अलग बात है कि उनके बताए सिद्धांतों और नीतियों की चर्चा साम्यवाद और समाजवाद की तुलना में बेहद कम हुई है। वे उस परंपरा के वाहक थे जो नेहरु के भारत नवनिर्माण की बजाय भारत के पुनर्निर्माण की बात करती है। एकात्म मानववाद के रूप में पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी ने भारत की तत्कालीन राजनीति और समाज को उस दिशा में मुड़ने की सलाह दी है, जो सौ फीसदी भारतीय है। वे मानव को विभाजित करके देखने के पक्षधर नहीं थे।पंडित दीन दयाल जी के एकात्म मानववाद का व्यावहारिक रूप भारत की प्राचीन अवधारणा ‘‘वसुदैव कुटुम्बकम’’ एवं ‘‘सर्वे भवन्तु सुखनः’’ का हो यह दूसरा स्वरूप है/पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने कहा था:- वे लोग जिनके सामने रोजी-रोटी का सवाल है, जिन्हें न रहने के लिए मकान है और न तन ढकने के लिए कपड़ा। अपने मैले-कुचैले बच्चों के बीच जो दम तोड़ रहे हैं और शहरों के उन करोड़ों निराष भाई-बहनों को सुखी व सम्पन्न बनाना हमारा लक्ष्य है।उन्होंने आर्थिक लोकतंत्र का सिद्धांत दिया। उनका कहना था कि जिस प्रकार प्रत्येक वयस्क नागरिक को मतदान का अधिकार मिलता है, ठीक उसी तरह लोगों को कार्य करने का भी मिलना चाहिए।उनका मानना था कि गरीबों को रोटी देने के बजाए उनको रोटी पैदा करने की ताकत देना जरूरी है। लोगों को सक्षम बनाना चाहिए, ताकि वे अपनी जरूरतों को पूरा कर सके ।
 सन 1947 में भारत राजनीतिक रूप से स्वतंत्र हो गया था। किंतु, अंग्रेजों के जाने के पश्चात भी औपनिवेशिक संस्कृति के अवशेष भारत के तथाकथित बुर्जुआ वर्ग पर हावी रहे। इस मानसिकता को राष्ट्र के सांस्कृतिक उत्थन में बाधक बताते हुए उन्होंने कहा था-‘‘राष्ट्रभक्ति की भावना को निर्माण करने और उसको साकार स्वरूप देने का श्रेय भी राष्ट्र की संस्कृति का ही है तथा वही राष्ट्र की संकुचित सीमाओं को तोड़कर मानव की एकात्मता का अनुभव कराती है। अतः संस्कृति की स्वतंत्रता परमावश्यक है। बिना उसके राष्ट्र की स्वतंत्रता निरर्थक ही नहीं, टिकाऊ भी नहीं रह सकेगी।‘‘ .उनका स्पष्ट मत था कि राष्ट्रीय एकता को अक्षुण्ण बनाए रखने के लिए राष्ट्र की सांस्कृतिक एकात्मता भी आवश्यक है।
सुविधाओं में पलकर कोई भी सफलता पा सकता है; पर अभावों के बीच रहकर शिखरों को छूना बहुत कठिन है। 25 सितम्बर, 1916 को जयपुर से अजमेर मार्ग पर स्थित ग्राम धनकिया में अपने नाना पंडित चुन्नीलाल शुक्ल के घर जन्मे पंडित दीनदयाल उपाध्याय ऐसी ही विभूति थे।
52 वर्ष की उम्र में पं दीनदयाल चले गये, पर अपने पीछे इतना कुछ छोड़ गये कि इस देश के राष्ट्रवादी उनके ऋण से कभी उऋण नहीं हो सकेंगे.एकात्म मानववाद के मंत्रद्रष्टा पंडित दीनदयाल उपाध्याय राजनीति में भारतीय संस्कृति एवं परंपरा के प्रतिनिधि थे. उनका स्थान सनातन भारतीय प्रज्ञा प्रवाह को आगे बढ़ानेवाले प्रज्ञा-पुरुषों में अग्रगण्य है. सादा जीवन उच्च विचार की प्रतिमूर्ति पंडित उपाध्याय के विचारों में देश की मिट्टी की सुवास को अनुभव किया जा सकता है. वह वास्तव में, राजनीति में ऋषि परंपरा के मनीषी थे.वह भारतीय जनसंघ से अवश्य जुड़े रहे, फिर भी दलीय संकीर्णताओं से ऊपर थे. राजनीति उनके लिए साध्य नहीं, समाज सेवा का साधन मात्र थी. अटलजी के अनुसार, ‘‘वह राजनीति का आध्यात्मीकरण चाहते थे. उनकी आस्थाएं प्राचीन अक्षय राष्ट्र जीवन की जड़ों से रस ग्रहण करती थीं, किंतु वह रूढ़िवादी नहीं थे.’
 
इतिहास के वर्तमान दौर में प. दीनदयाल उपाध्याय की पहचान भारतीय जनता पार्टी के मूल अवतार भारतीय जनसंघ के महान नेता के रूप में बनी है जबकि वह एक महान राष्ट्र नायक थे जिनका इस रूप में आकलन अभी राष्ट्र और इतिहास को करना है उसी तरह जिस तरह डा. भीमराव अम्बेडकर की पहचान मात्र दलित नेता के रूप में आंकी गयी थी जबकि वह एक महान राष्ट्र नायक थे | मगर उनकी इस छवि का एहसास अभी भी अपेक्षित रूप से दिखाई नही देता | यह विडम्बना तो है किन्तु है तथ्य |’ 

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