कौन संत और कौन असंत ?

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बड़ा प्रासंगिक प्रश्न है…। और बहुत पुराना भी…।
 
अभिषेक तिवारी : सनातन धर्म में संत को देवताओं से भी ऊंचा स्थान दिया गया है। हमारे ही संस्कृति में कहा गया कि ‘संत मिल जाएं तो जीवन में बसंत आ जाता है।” किंतु संत का चोला ओढ़े असंत (दुष्ट) मिले तो उसे कैसे पहचानें। यही सवाल एक बार भरत ने श्री राम से भी पूछा-
संत असंत भेद बिलगाई। प्रनतपाल मोहि कहहु बुझाई।। (उत्तरकांड)
अर्थ-हे शरणागत का पालन करनेवाले (श्रीराम)। संत और असंत के भेद अलग-अलग करके मुझ को समझाइए।
 
इस प्रश्न के उत्तर में 15 चौपाइयां और 3 दोहे लिखे गए हैं। इन्हें आप रामचरितमानस के उत्तरकांड में पढ़ सकते हैं। निश्चित ही संत और असंत से जुड़े कई प्रश्नों के उत्तर आपको मिल जाएंगे। इसके अलावा कबीर की चंद पंक्तियां ‘सो गुरु सत्य कहावे…” यू ट्यूब पर सर्च कर अर्थ सुनिए…। तो भी आपकी जिज्ञासा शांत होगी। 
 
दरअसल संत विशुद्ध ज्ञान और उदात्त चरित्र के अद्भुत मिश्रण का नाम है। संत वह है जो मन, वचन और कर्म से एक होता है। जो भय, क्रोध, काम, लोभ से कोसों दूर है। हिंदू धर्म में जब कोई साधु बनता है तो उसे तीन चीजों का त्याग करवाया जाता है…। उसे संकल्प दिलाया जाता है कि…लौकेषणा त्याग (लोक के लोभ का त्याग कर)…। पुत्रैषणा त्याग (चरणानुगामियों, चेलों का मोह मत रख)…। 3-वित्तैषणा त्याग (धन की इच्छा त्याग)…। इन तीन त्यागों के बिना कोई संन्यासी तक नहीं बन सकता तो फिर ‘संत” बनना तो बहुत आगे की बात है। संत की परिभाषा इसी महान देश से निकली है। क्यों कि हमारे देश संतों की खान रहा है। इसलिए जगतगुरु भी कहलाया है। आज भी इस देश में कई ऐसे संत हैं जो समाज को दिशा दिखा रहे हैं। अपना मूल धर्म निभा रहे हैं। 
 
किंतु। बड़ा सवाल यह भी है कि संतों का समृद्ध इतिहास लिए इस देश में आखिर राम-रहीम जैसे बाबा कैस पनप जाते हैं। कैसे ऐसे बाबाओं के लाखों चेले बन जाते हैं और हिंसा पर उतारू हो जाते हैं। हमें यह स्वीकार करना होगा कि इसके लिए आधुनिक समाज की विसंगतियां जिम्मेदार हैं। अज्ञानता जिम्मेदार है। हम हमारे बच्चों को 2 और 2 चार होता है, यह तो सिखाते हैं, मगर संत और असंत का भेद नहीं पढ़ा पाते। उन्हें समझा नहीं पाते। हम खुद पढ़ते भी हैं तो उसे चरित्र में नहीं उतार पाते। आखिर क्यों??? क्यों कि हम ऐसी शिक्षा पद्धति में पले-बढ़े हैं, जो केवल जीवीकोपार्जन करना सिखाती है। जीवन दर्शन नहीं दे पाती। हमारी आस्था केवल इसी पद्धति पर है। 
 
दरअसल हमारे आधुनिक ‘सेकुलर” समाज ने धार्मिक ग्रंथों से इतनी दूरी बना ली है कि उनके लिए ‘फिक्शन”, और ‘मूवी” ही जीवन का दर्शन है। फिर तो स्वभाविक रूप से कई राम-रहीम खड़े होंगे। एक नहीं हजारों मरेंगे। तब भी दोषी आप और हम ही होंगे। सनद रहे भविष्य की जिम्मेदार वर्तमान पर होती है। आप और हम ही तो देश का वर्तमान हैं…..!!

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