ढोंगी बाबाओ से बचो और जानो धर्म का वास्तविक स्वरुप….

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पंडित गोविन्द माधव पाण्डेय
पंडित गोविन्द माधव पाण्डेय
पंडित गोविन्द माधव पाण्डेय : आजकल के ढोंगी बाबाओ के कारनामों से आप सभी परिचित हो चुके हैं। कुछ लोग इनके जेल जाने को ईसाई मिशनरी का षड़यंत्र बता रहे हैं। कुछ इसे हिन्दू धर्म पर विदेशी ताकतों का हमला बता रहे है। 
 
दरअसल  ये लोग धर्म की सत्य अपरिभाषा को न जानने के कारण भ्रमित हो रहे हैं। धर्म और मत-मतान्तर के मध्य भेद न कर पाने के कारण भ्रमित हो रहे हैं। ये पाखंडी बाबा धर्म नहीं मत/मतान्तर को बढ़ावा देने वाले हैं। संसार में धर्म  केवल एक ही हैं। 
 
 वैदिक धर्म। बाकि सभी मानव निर्मित मत-मतान्तर है। इस लेख के माध्यम से आप धर्म और मत में भेद को जान सकते हैं। 
 
शंका 1:-  धर्म का अर्थ क्या हैं?
 
उत्तर:- 1. धर्म संस्कृत भाषा का शब्द हैं जोकि धारण करने वाली धृ धातु से बना हैं। “धार्यते इति धर्म:” अर्थात जो धारण किया जाये वह धर्म हैं। अथवा लोक परलोक के सुखों की सिद्धि के हेतु सार्वजानिक पवित्र गुणों और कर्मों का धारण व सेवन करना धर्म हैं। दूसरे शब्दों में यहभी कह सकते हैं की मनुष्य जीवन को उच्च व पवित्र बनाने वाली ज्ञानानुकुल जो शुद्ध सार्वजानिक मर्यादा पद्यति हैं वह धर्म है।
 
2 . जैमिनी मुनि के मीमांसा दर्शन के दूसरे सूत्र में धर्म का लक्षण है- लोक परलोक के सुखों की सिद्धि के हेतु गुणों और कर्मों में प्रवृति की प्रेरणा धर्म का लक्षण कहलाता हैं।
 
3. वैदिक साहित्य में धर्म वस्तु के स्वाभाविक गुण तथा कर्तव्यों के अर्थों में भी आया हैं। जैसे जलाना और प्रकाश करना अग्नि का धर्म है और प्रजा का पालन और रक्षण राजा का धर्म है।
 
4. मनु स्मृति में धर्म की परिभाषा,,,
 
धृति: क्षमा दमोअस्तेयं शोचं इन्द्रिय निग्रह:
धीर्विद्या सत्यमक्रोधो दशकं धर्म लक्षणं ६/९
 
अर्थात धैर्य,क्षमा, मन को प्राकृतिक प्रलोभनों में फँसने से रोकना, चोरी त्याग, शौच, इन्द्रिय निग्रह, बुद्धि अथवा ज्ञान, विद्या, सत्य और अक्रोध धर्म के दस लक्षण हैं।
 
दूसरे स्थान पर कहा हैं आचार:परमो धर्म १/१०८  अर्थात सदाचार परम धर्म हैं
 
5 . महाभारत में भी लिखा है,,,
 
धारणाद धर्ममित्याहु:,धर्मो धार्यते प्रजा: अर्थात
 
जो धारण किया जाये और जिससे प्रजाएँ धारण की हुई है वह धर्म है।
 
6 . वैशेषिक दर्शन के कर्ता महा मुनि कणाद ने धर्म का लक्षण यह किया है
 
यतोअभयुद्य निश्रेयस सिद्धि: स धर्म:
 
अर्थात जिससे अभ्युदय(लोकोन्नति) और निश्रेयस (मोक्ष) की सिद्धि होती है, वह धर्म है।
 
शंका 2:- स्वामी दयानंद के अनुसार धर्म की क्या परिभाषा है?
 
उत्तर:- जो पक्ष पात रहित न्याय सत्य का ग्रहण, असत्य का सर्वथा परित्याग रूप आचार है उसी का नाम धर्म और उससे विपरीत का अधर्म है। पक्षपात रहित न्याय आचरण सत्य भाषण आदि युक्त जो ईश्वर आज्ञा वेदों से अविरुद्ध है, उसको धर्म मानता हूँ। – सत्यार्थ प्रकाश मंतव्य
 
इस काम में चाहे कितना भी दारुण दुःख प्राप्त हो , चाहे प्राण भी चले ही जावें, परन्तु इस मनुष्य धर्म से पृथक कभी भी न होवें।- सत्यार्थ प्रकाश
 
शंका 3:- क्या हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई आदि धर्म सभी समान हैं अथवा भिन्न है? धर्म और मत अथवा पंथ में क्या अंतर हैं?
 
उत्तर: -हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई आदि धर्म नहीं अपितु मत अथवा पंथ हैं।  धर्म और मत में अनेक भेद हैं।
 
1.  धर्म ईश्वर प्रदत हैं और जिसे ऊपर बताया गया हैं, बाकि मत मतान्तर हैं जो मनुष्य कृत है।
 
2. धर्म लोगो को जोड़ता हैं जबकि मत विशेष लोगो में अन्तर को बढ़ाकर दूरियों को बढ़ावा देते है।
 
3. धर्म का पालन करने से समाज में प्रेम और सोहार्द बढ़ता है, मत विशेष का पालन करने से व्यक्ति अपने मत वाले को मित्र और दूसरे मत वाले को शत्रु मानने लगता है।
 
4. धर्म क्रियात्मक वस्तु हैं मत विश्वासात्मक वस्तु हैं। 
 
5. धर्म मनुष्य के स्वाभाव के अनुकूल अथवा मानवी प्रकृति का होने के कारण स्वाभाविक है और उसका आधार ईश्वरीय अथवा सृष्टि नियम है परन्तु मत मनुष्य कृत होने से अप्राकृतिक अथवा अस्वाभाविक है।
 
6. धर्म एक ही हो सकता हैं , मत अनेक होते हैं।
 
7. धर्म सदाचार रूप हैं अत: धर्मात्मा होने के लिये सदाचारी होना अनिवार्य है। परन्तु मत अथवा पंथ में सदाचारी होना अनिवार्य नहीं है।
 
8. धर्म ही मनुष्य को मनुष्य बनाता है अथवा धर्म अर्थात धार्मिक गुणों और कर्मों के धारण करने से ही मनुष्य मनुष्यत्व को प्राप्त करके मनुष्य कहलाने का अधिकारी बनता है जबकि मत मनुष्य को केवल पन्थाई या मज़हबी अथवा अन्धविश्वासी बनाता है। दूसरे शब्दों में मत अथवा पंथ पर ईमान लाने से मनुष्य उस मत का अनुयायी बनाता है। नाकि सदाचारी या धर्मात्मा बनता है।
 
9. धर्म मनुष्य को ईश्वर से सीधा सम्बन्ध जोड़ता है और मोक्ष प्राप्ति निमित धर्मात्मा अथवा सदाचारी बनना अनिवार्य बतलाता है।
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