21 अगस्त की रात्रि सूर्य ग्रहण परंतु भारत में नहीं दिखेगा।

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solar eclipse
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Madan Gupta Spatu
मदन गुप्ता सपाटू

एक वैज्ञानिक एवं ज्योतिषीय विश्लेषण
मदन गुप्ता सपाटू, ज्योतिषविद्, चंडीगढ़ : सोमवार की रात्रि भारतीय समयानुसार 9 बजकर 16 मिनट से लेकर 2 बजकर 34 मिनट तक ग्रहण काल रहेगा। यह सूर्य ग्रहण सिंह राशि, के अधीन मघा नक्षत्र  में घटित होगा। यह भारत के किसी भी भाग में दर्शनीय नहीं होगा अपितु पश्चिमी यूरोप, उत्तरी अमेरिका,  उत्तर- पष्चिमी अफ्रीका ,प्रशान्त व एटलांटिक महासागर, में दिखेगा।
ग्रहण का आरंभ 21ः16, खग्रास प्रारंभ-22ः18, परमग्रास- 23ः51, खग्रास समाप्त- 25ः32, ग्रहण समाप्त- 26ः34
क्योंकि यह ग्रहण भारत में दिखेगा ही नहीं, इसलिए इसके सूतक या ज्योतिषीय प्रभाव को कोई औचित्य नहीं बनता। इस रात आप आराम से सोएं।
विश्व की आने वाली घटनाएं
यह ग्रहण सिंह राशि में  हैं और 18 अगस्त ,2017 को राहु कर्क राशि में आ गए हैं। मंगल पहले ही अपनी नीच राशि कर्क में हैं और इस तरह राहु- मंगल का विध्वंसक योग बन गया है और 27 अगस्त तक रहेगा।  इस के अलावा कालसर्प योग भी आग में घी का काम कर सकता है। इस मध्य भारत – चीन, भारत – पाकिस्तान सीमा विवाद पर कड़ी नजर और सुरक्षा बढ़ानी होगी। देश के आंतरिक शत्रुओं से भी सावधान रहना होगा। आग्नेय , विस्फोटक घटनाओं , सड़क , रेल  तथा वायु दुर्घटनाओं के प्रति सचेत रहना होगा। जहां जहां यह ग्रहण दर्शनीय है, वहां सुनामी या भूकंप से बचना होगा।

परंतु ग्रहण के विषय में कुछ वैज्ञानिक एवं ज्योतिषीय जानकारी सब को होनी चाहिए।
सूर्य व चंद्र ग्र्रहण खगोलविदों, वैज्ञानिकों , ज्योतिषियों तथा एक आम आदमी के लिए भी उत्सुकता का विषय सदियों से रहे हैं। भारत की गलियों में तो ग्रहण के समय ही मांगने वाले ‘ ग्रहण का दान दो जी’ की आवाजें लगाने लगते हैं जो एक आम आदमी के ग्रहण ज्ञान का सबूत है। वैज्ञानिक इसे एक अन्वेषण व अनुसंधान के तौर पर देखते हैं और ज्योतिषी इससेे आम लोगों के जीवन पर होने वाले प्रभावों को रेखांकित करता है। ज्योतिष शास्त्र भी खगोलीय घटनाओं की व्याख्या करता है।
जब आकाश में सूर्य और चंदमा अपनी अपनी गति से घूमते रहते हैं तो कई बार दोनों धरती की एक सीध में पड़ जाते हैं जिससे चंद्रमा की छाया पृथ्वी पर पड़ती है और सूर्य का वह भाग धरती वासियों को काला सा दिखने लगता है और इसे सूर्य ग्रहण कहा जाता है। ऐसा केवल अमावस्या के दिन ही संभव हो सकता है और चंद्र ग्रहण केवल पूर्णिमा पर ही लग सकता है।
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बहुत से लोग ग्रहण को मात्र एक खगोलीय घटना ही मानते हैं और इसमें  किसी भी प्रकार की सावधानी बरतने को अंधविशवास या दकियानूसी करार देते हैं। यह उनकी मान्यता हो सकती है। परंतु वैज्ञानिक दृष्टि से भी ग्रहण के समय विकीरण के कारण आखों, रक्त संचार, रक्त चाप और खाद्य पदार्थों पर विपरीत प्रभाव पड़ता है। सूर्य ग्रहण के समय वैज्ञानिक ,सूर्य को नंगी आखों से न देखने की सलाह क्यों देते हैं यदि यह केवल मात्र खगोलीय घटना ही है। भारत की हर परंपरा के पीछे वैज्ञानिक कारण रहे हैं। आज वैज्ञानिक सुपर कंप्यूटर के माध्यम से ग्रहण लगने और समाप्त होने का समय बताते हैं जबकि महाभारत काल में तो हमारे वैज्ञानिक ऋषि मुनियों एवं गणितज्ञों ने त्रिकोणमीति अर्थात ट्र्ग्निोमिट्र्ी जो भारत की देन है, की सहायता से  5000 साल पहले ही बता दिया था कि महाभारत युद्ध के दौरान कुरुक्षेत्र में पूर्ण सूर्य ग्रहण लगेगा। इसी घटना का लाभ उठाते हुए महाभारत के दौरान अंधकार छाते ही धोखे से जयद्रथ का वध करवा दिया गया था। पूर्ण सूर्य  ग्रहण लगने से जब भरी दोपहरी में अंधकार छा जाता हैे तो पक्षी  भी अपने घोंसलों में लौट आते हैं। यह पिछले सूर्य ग्रहण के समय लोग देख चुके हैं और पूरे विश्व के वैज्ञानिक भी । तो ग्रहण का प्रभाव हर जीव जन्तु, मनुष्य, तथा अन्य ग्रहों पर  पड़ता है। गुरुत्वाकर्षण घटने या बढ़ने से धरती पर भूकंप आने की संभावना ग्रहण के 41 दिन पहले या बाद तक रहती है।
    
पश्चिमी देश के लोग समय समय पर ऐसी अवैज्ञानिक बातें फैलाते रहते हैं जैसे कुछ वर्ष पहले दुनिया समाप्त होने की अफवाह उड़ा दी या किसी धूमकेतु गिरने की। अभी 12 अगस्त की रात को पूरा दिन होने की बात कह दी। भारतीय ज्योतिष तो प्राकृतिक आपदाओं , मौसम आदि की जानकारी सदियों से देता आ रहा है जबकि  पश्चिम को यही कन्फयूजन था कि धरती गोल है या चपटी और भारत में ग्रहों , नक्षत्रों , राशियों की जानकारी आदिकाल से प्रचलित हैं।

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