हमारा वास्तविक घर ब्रह्मलोक है : आचार्य उमेशचन्द्र कुलश्रेष्ठ

मनमोहन कुमार आर्य, देहरादून। आर्य समाज के विद्वान आचार्य उमेशचन्द्र कुलश्रेष्ठ जी ने वैदिक साधन आश्रम तपोवन में चल रहे ऋग्वेद पारायण यज्ञ की दिनांक 13 मई, 2018 को पूर्णाहुति के बाद यज्ञ पर एक सारगर्भित प्रवचन दिया। उन्होंने कहा कि स्विष्टकृदाहुति के बाद प्रजापत्याहुति मौन होकर दी जाती है। प्रश्न है कि यह आहुति मौन होकर क्यों दी जाती है? इससे सम्बन्धित एक कथा सुनाते हुए आचार्य जी ने कहा कि एक बार वाणी और मन में बहस हो गई। वाणी ने कहा वह बड़ी है और मन ने कहा कि वह बड़ा है। वाणी ने कहा कि मनुष्यों का सारा व्यवहार मुझ वाणी से होता है। वाणी से ही सारे वेद मन्त्र बोले जाते हैं। ईश्वर का उपदेश व व्याख्यान भी वाणी से होता है। मन ने वाणी के दावे को अस्वीकार कर दिया। उसने कहा कि मैं वाणी से बड़ा हूं। उसने कहा कि मन जिस इन्द्रिय से जुड़ता है वहीं इन्द्रिय काम कर सकती है। मन ने वाणी को कहा कि तुम भी मुझसे जुड़ कर ही काम कर सकती हो। मुझसे जुड़े बिना काम नहीं कर सकती। आचार्य जी ने एक बारात का उदाहरण देकर समझाया और कहा कि यदि मन किसी कार्य में व्यस्त हो तो सामने से बारात भी निकल जाये तो भी उस मनुष्य को उसका कुछ भी पता नहीं चलता। उन्होंने एक विद्यार्थी का उदाहरण देकर कहा कि यदि विद्यार्थी का मन पढ़ने में न हो तो वह आसान से आसान पाठ भी याद नहीं कर सकता।

वाणी मन की बातों से सन्तुष्ट नहीं हुई, तो दोनों प्रजापति के पास पहुंचे। दोनों ने अपने अपने तर्क दिये। मन ने कहा कि शब्द आकाश का गुण है। परमात्मा आकाश से भी सूक्ष्म है। मन ने प्रजापति को कहा कि जब मनुष्य वा योगी अपने मन को एकाग्र करते हैं तब उन्हें ईश्वर का साक्षात्कार होता है। मन ने कहा कि मैं ईश्वर का साक्षात्कार कराता हूं। वाणी परमात्मा प्राप्त नहीं करा सकती। प्रजापति मन की बातों को सुन कर उससे सन्तुष्ट हो गये। इससे वाणी नाराज हो गई। उसने प्रजापति को अपनी नाराजगी दिखाते हुए कहा कि जब तुम्हारे नाम की आहुति यज्ञ में दी जाया करेगी तो मैं मौन रहूंगी। आचार्य उमेशचन्द्र कुलश्रेष्ठ जी ने कहा कि मन शरीर का बड़ा पावन अंग है। यह मन सात्विक, राजसिक और तामसिक तीन प्रकार का होता है। एक मनुष्य यज्ञ करने जाता है तो उसकी भावना सात्विक होती है। उसने यज्ञ किया। यज्ञ की समाप्ति पर चलने लगा तो उसने वहां किसी की नई चप्पल देखी और मन में उसे चुरा लेने का विचार आया। वह चप्पल अपने घर ले गया। उससे यह पाप हो गया। घर पहुंच कर उसने विचार किया तो लगा कि उसने यह पाप किया है। वह चप्पल लेकर पुनः यज्ञ के स्थान पर गया और वह चप्पल वहां रख दी जहां से उसने उठाई थी। चप्पल चोरी करने का विचार व उसे अपने साथ घर लाना राजसिक व तामसिक मन के कारण हुआ और उसे लौटाने की भावना सात्विक मन के कारण बनी। आचार्य जी ने कहा कि सबके साथ ऐसी घटनायें होती हैं। उन्होंने कहा कि सात्विक मन पाप नहीं करता। राजसिक व तामसिक मन पाप करता है। आचार्य जी ने कहा कि सत्संग से अपने मन को सात्विक बनाईये। इससे आपका मन पाप में नहीं जायेगा। आचार्य जी ने कहा कि गीता में भी कहा गया है कि मन अति चचंल स्वभाव वाला है। मन पर नियंत्रण करना आवश्यक है। मन जड़ वस्तु है। जरा सी देर में, सन्ध्या व यज्ञ करते हुए भी, यह मुम्बई चला जाता है व कुछ ही क्षणों में लौट भी आता है।

आचार्य जी ने अपने मन को सात्विक व पवित्र बनाने को कहा। उन्होंने कहा कि सात्विक अन्न से मन पवित्र बनता है। जिनके घरों में अधर्म वा पाप की कमाई आती है उन लोगों का मन पवित्र नहीं बन सकता। हम जो भोजन करते हैं उसमें अन्न की पवित्रता आवश्यक है। हमारी कमाई के साधन भी पवित्र होने चाहिये और भोजन भी भक्ष्य पदार्थों का शुद्ध व पवित्र बना हुआ होना चाहिये। हमारे सभी कार्यों में सत्यता होनी चाहिये व धर्म का पालन होना चाहिये। अधर्म की कमाई करने से परिवार में अशान्ति व दुःख उत्पन्न होते हैं। आचार्य जी ने सबको भद्र ही देखने की सलाह दी। अभद्र देखेंगे तो आपका मन विकारों को प्राप्त होकर अशान्ति व दुःख उत्पन्न करने वाला होगा। आचार्य जी ने समझाया कि रूप आंखों का अन्न है। कानों का अन्न शब्द हैं। उन्होंने कानों से भद्र शब्दों का श्रवण करने का सुझाव दिया। उन्होंने कहा कि हमारे सारे संस्कार चित्त में रहते हैं। जिह्वा से हमें केवल पवित्र पदार्थों का ही भोजन करना है। उन्होंने कहा कि मांस व अण्डे आदि अभक्ष्य पदार्थ हैं। इन्हें खाने से मन अपवित्र होकर गलत काम करता है और अभक्ष्य पदार्थों के सेवन रूपी पाप कर्मों का कठोर दण्ड जीवात्मा को भोगना होता है।

आचार्य उमेशचन्द्र कुलश्रेष्ठ जी ने कहा कि हर मनुष्य किसी न किसी मत या पन्थ से जुड़ा हुआ है। क्या इन मतों के किसी व्यक्ति का मन पूर्णतया पवित्र है? उन्होंने कहा कि देश में भ्रष्टाचार व कदाचार विद्यमान है। इसके निवारण के लिए उन्होंने पवित्र अन्न का सेवन करने की सलाह दी। टीवी की चर्चा कर उन्होंने कहा कि पूरा परिवार टीवी के अभद्र कार्यक्रमों को मिलकर देखता है। इससे मनुष्य के चित्त में दूषित संस्कारों का संग्रह हो रहा है। उन्होंने कहा कि ऐसा दूषित अन्तःकरण एकाग्र-चित्त होकर प्रभु का चिन्तन व ध्यान नहीं कर सकता। मन की पवित्रता बहुत आवश्यक है। आचार्य जी ने उपनिषद की यम व नचिकेता की कथा को प्रस्तुत कर कहा कि हमारा शरीर रथ है। इस शरीर में बैठा हुआ हमारा आत्मा ईश्वर को प्राप्त करने की यात्रा कर रहा है। हमारी बुद्धि सारथि व रथ की ड्राइवर है जो शरीर को चलाती है। हमारी सभी इन्द्रियां रथ के घोड़े व शरीर रूपी गाड़ी के पहिये हैं। हमारा मन लगाम अर्थात् ब्रेक है। इस शरीर रूपी रथ में सवार हमारी आत्मा है। उन्होंने कहा कि यदि हमारा यह शरीर रूपी रथ बिगड़ गया, रूग्ण, कमजोर अथवा अस्वस्थ हो गया तो यह अपने गन्तव्य पर नहीं पहुंच सकता। हमारा वास्तविक घर तो ब्रह्मलोक है। हमारा लक्ष्य अपने वास्तविक घर मोक्ष में पहुंचना है। मोक्ष का अर्थ है कि परम पिता का साक्षात्कर कर उसे प्राप्त कर लेना। इस काम के लिए हमें अपने शरीर को स्वस्थ, पवित्र व बलवान बनाना होगा।

आचार्य जी ने कहा कि मन के तप की चर्चा गीता में की गई है। वहां बताया गया है कि हमारे मन के भाव शुद्ध होने चाहिये और उसमें बुरे विचार नहीं आने चाहियें। हमारे मन में किसी के प्रति द्वेष न हो। हम किसी को हानि न पहुंचायें। शुद्ध मन जल्दी एकाग्र हो जाता है। चित्त सब स्मृतियों को संग्रहित करता व उसे संजो कर रखता है। आचार्य जी ने प्रश्नात्मक भाषा में कहा कि मनुष्य की मृत्यु होने पर चिता में चित्त आदि सब जल जाता है? इसका उत्तर देते हुए उन्होंने कहा कि हमारा चित्त हमारे भौतिक शरीर का अंग नहीं अपितु सूक्ष्म शरीर का अंग है। मृत्यु के समय शरीर से जब आत्मा निकलती है तो यह उसी के साथ चला जाता है। इसी चित्त के साथ हमारी आत्मा का पुनर्जन्म होता है। पुनर्जन्म में इस चित्त के संस्कार वृक्ष के बीज की तरह फलते फूलते हैं। उन्होंने श्रोताओं को कहा कि आप संकल्प करें कि हम पवित्र अन्न का ही सेवन करेंगे जिससे हमारा मन सात्विक बना रहे।

आचार्य जी ने कहा कि हमारे यज्ञ सात्विक अन्न से ही सम्पन्न होते हैं। हमारे घरों में अशान्ति व कलह आदि का कारण हमारे मन की विकृतियां हैं। सहनशीलता, सबके प्रति प्रेम तथा दूसरों के सम्मान की भावना आदि हमारे दूषित मन के कारण हममें नहीं है। दूसरों की सेवा करने की भावना भी हममें नहीं है। उन्होंने कहा कि बड़ों की सेवा सात्विक मन से होती है। जिस मन में काम, क्रोध आदि के संस्कार हों वह सात्विक काम नहीं कर सकता। आचार्य उमेश चन्द्र कुलश्रेष्ठ जी ने कहा अपने मन को सात्विक बनाईये। सात्विक मन पाप नहीं करता है। आचार्य जी ने कहा कि हमारे मन की तीन स्थितियां होती हैं यथा देव मन, यक्ष मन तथा धृति मन। उन्होंने मन की तीनों स्थितियों को समझाया। उन्होंने कहा कि संकल्प करने पर हमारा धृति मन हमें प्रातः 4 बजे उठा देता है। आचार्य जी ने कहा कि समस्याओं का समाधान धृति मन से विचार करने पर होता है। धृति मन को उन्होंने आत्मा का सबसे विश्वसनीय बताया। उन्होंने कहा कि देव मन हमारी ज्ञानेन्द्रियों पर नियंत्रण रखता है। आचार्य जी ने इसे उदाहरण देकर समझाया। विद्वान आचार्य ने कहा कि तीनों मन आत्मा के कार्यों में सहयोग देते हैं। आत्मा मन व इन्द्रियों के साथ मिलकर कर्म करने में समर्थ होता है। उन्होंने

आचार्य जी ने कहा कि अपने मन को बिगड़ने मत दीजिये। अपने मन को पवित्र रखिये। इसके लिये वेद, सत्यार्थव्रकाश सहित ऋषि व वैदिक विद्वानों के ग्रन्थों का स्वाध्याय व अध्ययन करना आवश्यक है। आचार्य जी ने कहा कि स्वाध्याय परम श्रम है। स्वाध्याय बुद्धि का श्रम है। स्वाध्याय से बुद्धि पवित्र होती है। मन, बुद्धि व सभी इन्द्रियां स्वाध्याय करने से पवित्र होती हैं। अपने व्याख्यान को विराम देते हुए आचार्य उमेश चन्द्र कुलश्रेष्ठ जी ने सबको स्वाध्याय करने की प्रेरणा दी व सबका धन्यवाद किया। इस अवसर पर स्वामी चित्तेश्वरानन्द जी ने सामूहिक प्रार्थना कराई और यज्ञ की ब्रह्मा डा. आचार्या नन्दिता शास्त्री चतुर्वेदा जी ने यजमानों को आर्शीवचन कहे। प्रार्थना व आशीर्वचनों को हम पृथक से प्रस्तुत करेंगे। ओ३म् शम्।

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