मृदा स्वास्थ्य कार्ड योजना से मिट्टी की उर्वरकता में सुधार लाने में मदद मिलेगी

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farmerपांडुरंग हेगडे : मृदा जल संरक्षण अनुसंधान एवं प्रशिक्षण संस्थान, देहरादून के अनुसार भारत में पिछले कुछ वर्षों में उर्वरकों, कीटनाशकों और कीटनाशक दवाईयों के अविवेकपूर्ण और अधिक प्रयोग की वजह से प्रत्येक वर्ष 5334 लाख टन मिट्टी खत्म हो रही है। औसतन 16.4 टन प्रति हेक्टेयर उपजाऊ मिट्टी प्रत्येक वर्ष समाप्‍त हो रही है।

गैर-विवेकपूर्ण तरीके से उर्वरकों के इस्तेमाल से मिट्टी की उर्वरकता में कमी आती है जिसके फलस्वरूप मिट्टी के सूक्ष्म तथा सूक्ष्मतर पोषक तत्वों में कमी हो जाती है और कृषि पैदावार में भी कमी आ जाती है।

इस समस्या की गंभीरता को समझते हुए प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने पैदावार को बढ़ावा देने के लिए देश भर में मिट्टी के स्वास्थ्य में सुधार पर ध्यान केंद्रित करने को कहा है। “वंदे मातरम्” गीत का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि “सुजलाम और सुफलाम” के सही मायने को चरितार्थ करने के लिए हमें मिट्टी की सेवा और मिट्टी के स्वास्थ्य में सुधार लाना आवश्यक है।

मिट्टी के स्वास्थ्य में सुधार लाने के लिए उन्होंने मृदा स्वास्थ्य कार्ड योजना (एसएचसी) की शुरूआत की। इसके लिए भारत सरकार के कृषि एवं सहकारिता मंत्रालय ने पूरे देश में 14 करोड़ मृदा स्वास्थ्य कार्ड (एसएचसी) जारी करने का लक्ष्य रखा है। इसके लिए अलग से 568 करोड़ रूपये का बजट भी रखा गया है। वित्तीय वर्ष 2015-16 में राज्य सरकार के सहयोग से इसकी शुरूआत करते हुए प्रत्येक तीन वर्षों में 253 लाख मिट्टी के नमूनों की जांच की जाएगी जिसके फलस्वरूप करीब 14 करोड़ मृदा स्वास्थ्य कार्ड (एसएचसी) जारी किए जा सकेंगे।

इसके लिए वृहत क्षेत्र में काम करना और जमीनी स्तर पर आंकड़े इकट्ठा करना कठिन कार्य है। फिर भी कृषि मंत्रालय मिट्टी के नमूने की जांच करने और मृदा स्वास्थ्य कार्ड (एसएचसी) जारी करने के लिए प्रतिबद्ध है। इस वर्ष 15 नवंबर तक पूरे देश में 34.47 लाख मृदा स्वास्थ्य कार्ड (एसएचसी) वितरित किए जा चुके हैं।

मिट्टी के नमूनों की जांच में तेजी लाने के लिए सरकार ने मृदा स्वास्थ्य प्रबंधन योजना के तहत 460 नयी मिट्टी परीक्षण प्रयोगशालाओं को मंजूरी दी है। मोबाइल मिट्टी परीक्षण प्रयोगशालाओं के अलावा कृषि मंत्रालय ने वित्तीय वर्ष 2016-17 में 2296 मिट्टी परीक्षण की छोटी प्रयोगशालाओं को काम करने की मंजूरी प्रदान की है। इससे सुदूर इलाकों में मिट्टी के परीक्षण में तेजी आएगी। इससे तकनीकी रूप से कुशल और शिक्षित ग्रामीण युवाओं के लिए भी रोजगार के अवसर पैदा हुए हैं।

इन मृदा स्वास्थ्य कार्डों से मिट्टी की उर्वरकता में सुधार लाने में कैसे मदद मिलेगी?

इस जांच के पहले चरण में मिट्टी में मौजूद पोषक तत्वों नाइट्रोजन, फॉस्फोरस और पोटेशियम, सूक्ष्म पोषक तत्वों और पीएच का पता चल जाएगा। इन बुनियादी जानकारियों का उपयोग कर किसान दूसरे चरण में विशिष्ट खुराक का उपयोग कर मिट्टी की उर्वरकता में सुधार कर पैदावार बढ़ा सकता है। इन कार्डों में किसानों के खेतों की मिट्टी में मौजूद पोषक तत्वों की स्थिति के आधार पर सलाह होगी। इसमें मिट्टी की बर्बादी रोकने और मिट्टी की उर्वरता में सुधार के लिए किस तरह के मृदा प्रबंधन करने की जरूरत है, इसके बारे में भी सुझाव दिए गए होंगे।

ये कार्ड तीन फसल चक्रों के लिए जारी किये जाएंगे, जिसमें प्रत्‍येक फसल चक्र के बाद की मृदा की स्थिति दर्ज होगी। इस प्रकार एसएचसी केवल एक फसल चक्र का समाधान नहीं है, बल्कि यह एक सतत प्रक्रिया है, जिससे किसानों को मृदा स्‍वास्‍थ्‍य पर मूलभूत जानकारी उपलब्‍ध होगी।

गैर-वैज्ञानिक तरीके से खेती करना और उर्वरकों तथा कीटनाशकों के अधिकतम उपयोग से मिट्टी की उर्वरकता समाप्‍त हो रही और कृषि मृदा अनुपायोगी बनती जा रही है। जलवायु परिवर्तन के प्रभाव से सिंचाई के लिए जल की उपलब्‍धता बहुत कम हो जाएगी। उच्‍च तापमान के कारण मिट्टी में से कार्बनिक पदार्थ कम होने और लगातार मिट्टी के कटाव से बंजर भूमि बढ़ेगी।

इन समस्‍याओं के समाधान के लिए समस्‍या का ठोस डाटा बेस तैयार करने की आवश्‍यकता है। देश भर से एकत्रित मिट्टी के नमूने और मिट्टी की जांच से देश के अलग-अलग पारिस्थितिकीय क्षेत्र में मिट्टी की स्थिति के बारे में वैज्ञानिक जानकारी उपलब्‍ध होगी। इसके आधार पर मिट्टी की उर्वरकता को दोबारा हासिल करने के उपायों का व्‍यावहारिक कार्यान्‍वयन संभव होगा। इससे न केवल लागत कम आएगी, बल्कि किसानों की फसल का उत्‍पादन भी अधिक होगा और अंतत: गरीबी समाप्‍त करने में मदद मिलेगी।

स्‍वस्‍थ मृदा और स्‍वस्‍थ भोजन के बीच घनिष्‍ठ संबंध है। कृत्रिम उर्वरकों और कीटनाशकों के अंधाधुंध उपयोग के कारण हमारे देश की मिट्टी बहुत जहरीली हो गई है। जहरीली मिट्टी से उगने वाली फसल से बनाए जाने वाले भोजन से स्‍वास्‍थ्‍य समास्‍याएं बढ़ेंगी। रसायनिक उर्वरक डालकर हम अधिक पैदावार तो ले सकते हैं, लेकिन उस फसल में सूक्ष्‍म पोषक तत्‍वों की कमी होती है, जो स्‍वस्‍थ शरीर के लिए आवश्‍यक है।

विश्‍व की 17 प्रतिशत आबादी और भौगोलिक क्षेत्र के मात्र दो प्रतिशत तथा गरीबी के उच्‍च स्‍तर के कारण कृषि से जुड़ी 55 प्रतिशत आबादी के लिए खाद्य सुरक्षा और रोजगार प्रदान करने में मिट्टी की स्थिति में सुधार करना बहुत आवश्‍यक हो गया है।

संयुक्‍त राष्‍ट्र के खाद्य निकाय एफएओ (खाद्य और कृषि संगठन) ने एसएचसी पहल की सराहना की है। 2015 में अंतर्राष्‍ट्रीय मृदा वर्ष के अवसर पर एफएओ के निदेशक जोस ग्रेजियानो ने कृषि मंत्री श्री राधा मोहन सिंह से कहा था कि खाद्य और संपूर्ण स्‍वस्‍थ मृदा सुरक्षा के लिए एसएचसी अन्‍य देशों के लिए मॉडल हो सकता है।

प्रधानमंत्री श्री नरेन्‍द्र मोदी ने ‘स्‍वस्‍थ धरा, खेत हरा’ का नारा दिया है, जिसका अर्थ स्‍वस्‍थ भूमि और हरित खेत है। स्‍वस्‍थ भूमि के लिए हमें स्‍वस्‍थ मृदा की आवश्‍यकता है। केन्‍द्रीय कृषि मंत्रालय स्‍वस्‍थ मृदा और हरित खेतों के लिए वातावरण तैयार करने के वास्‍ते राज्‍य सरकारों के साथ मिलकर कार्य कर रहा है, जिससे किसानों की आय को दोगुना करने के लक्ष्‍य को हासिल करने और गरीबी की समस्‍या का समाधान करने का मार्ग प्रशस्‍त होगा।

*लेखक कर्नाटक में एक स्‍वतंत्र पत्रकार और स्‍तंभ लेखक हैं। वे नियमित रूप से पर्यावरण संबंधी मुद्दों पर लिखते हैं।

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