क्या आप जानते है? पौराणिक और नवीन कृषि पद्धतियों में क्या अन्तर हे

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सरसों के खेत का नयनाभिराम दृश्य मन को मंत्रमुग्ध कर देते है।
सरसों के खेत का नयनाभिराम दृश्य मन को मंत्रमुग्ध कर देते है।
 सरसों के खेत का  नयनाभिराम दृश्य मन को मंत्रमुग्ध कर देते है।

सरसों के खेत का नयनाभिराम दृश्य मन को मंत्रमुग्ध कर देते है।

vijay tewariविजय तेवाडी,  भवाली :  यह एक उत्तराखंड में कृषि करने का पुराना तरीका है।  पहले से लोग खर- पतवार को खेत में ही नष्ट कर देते थे ताकि, खाद बन जाये फिर तीन  साल के लिए खेत को छोड देते थे।  तीन वर्ष बाद उसी खेत में बुआई की जाती थी।  ताकि उस खेत से सही फसल ली जा सके।  वर्तमान में जन घननत्व बढने के बाद किसान ऐसा अब नही करते है।  मध्य एशिया में खेती करने की बहुत पुरानी तकनिकी है।   लेकिन किसान खर पतवार को खेत में ही नष्ट कर देते है।  जब खेत को तीन वर्ष के लिए छोडा जाता था।  उससे खेत  की उर्वरकता शक्ति बढती थी।  समय के साथ बहुत परिवर्तन हुआ।  कई अप्राकृतिक रसायन आ गये जिसको कृषक इस्तमाल कर रहा है।  वास्तव में खाने के रूप में हम जहर खा रहे है।  क्या कर सकते है जन घननत्व बढ गया है।  अगर खेतों में रसायन इस्तेमाल ना हो तो माँग पूर्ति में असन्तुलन स्थापित हो जायेगा।
… बड़ी जनसंख्या की ज़रूरतों को पूरा करने के लिए फ़सल को जल्दी पकने को मजबूर किया जाता है …  वही हम सब लोग खा रहे है। जो कदापि स्वास्थ्य के दृष्टिकोण से उत्तम कभी नही हो सकता है।  इन्सान के पास अपनी आवश्यकता की पूर्ति करने के लिए चाहे कितने ही साधन क्यो ना हो गये है।  लेकिन आज के समय में इसका खानपान ठीक नही है।  हर चीजों में मिलावट है।  चाहे कितने ही बड़ी कम्पनी का हम खाना खाये।  क्योकि अनाजो में जहर घुल चुका है।  चिन्तनीय एवं विचारणीय प्रश्न? यह हमारे राज्य का नही पूरे भारत की समस्या है।  शायद यह समस्या पूरे विश्व की हो सकती है।  जहाँ जन घननत्व बडा है।  अगर समय पर इस बारे में ना सोचा जाये तो यह एक आगामी समय में ज्वलंत समस्या बन जायेगी।  पानी के संरक्षण के साथ इस दिशा में सोचने की जरूरत अब आन पड़ गयी  है।  ताकि भूमंडलीकरण की समस्या पर निदान किया जाये। 
बडा हुआ जन घनतत्व इसका मुख्य कारण दिखता है।  और जल्दी मुनाफा कमाना भी इसका कारण हो सकता है। जो जिन्दगी में जहर घोल रहा है।

 

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